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Badhe Chalo - बढे़ चलो

Badhe Chalo - Sohanlal Dwivedi ::

बढे़ चलो - सोहनलाल द्विवेदी













न हाथ एक शस्त्र हो, 
न हाथ एक अस्त्र हो, 
न अन्न वीर वस्त्र हो, 
हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो । 

रहे समक्ष हिम-शिखर, 
तुम्हारा प्रण उठे निखर, 
भले ही जाए जन बिखर, 
रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

घटा घिरी अटूट हो, 
अधर में कालकूट हो, 
वही सुधा का घूंट हो, 
जिये चलो, मरे चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

गगन उगलता आग हो, 
छिड़ा मरण का राग हो,
लहू का अपने फाग हो, 
अड़ो वहीं, गड़ो वहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

चलो नई मिसाल हो, 
जलो नई मिसाल हो,
बढो़ नया कमाल हो,
झुको नही, रूको नही, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

अशेष रक्त तोल दो, 
स्वतंत्रता का मोल दो, 
कड़ी युगों की खोल दो, 
डरो नही, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

Nav Varsh - नववर्ष

Nav Varsh - Sohanlal Dwivedi :: 

नववर्ष - सोहनलाल द्विवेदी













स्वागत! जीवन के नवल वर्ष 
आओ, नूतन-निर्माण लिये, 
इस महा जागरण के युग में 
जाग्रत जीवन अभिमान लिये; 

दीनों दुखियों का त्राण लिये 
मानवता का कल्याण लिये, 
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष! 
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये। 

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति 
की ज्वालाओं के गान लिये, 
मेरे भारत के लिये नई 
प्रेरणा नया उत्थान लिये; 

मुर्दा शरीर में नये प्राण 
प्राणों में नव अरमान लिये, 
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत! 
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये! 

युग-युग तक पिसते आये 
कृषकों को जीवन-दान लिये, 
कंकाल-मात्र रह गये शेष 
मजदूरों का नव त्राण लिये; 

श्रमिकों का नव संगठन लिये, 
पददलितों का उत्थान लिये; 
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत! 
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये! 

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के 
मद का चिर-अवसान लिये, 
दुर्बल को अभयदान, 
भूखे को रोटी का सामान लिये; 

जीवन में नूतन क्रान्ति 
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये, 
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष 
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!


कबीर_भाग-2: पदावली_परिशिष्ट-21

सनक सनंद महेस समाना। सेष नाग तेरी मर्म न जाना॥

संत संगति राम रिदै बसाई।
हनुमान सरि गरुड़ समाना। सुरपति नरपति नहिं गुन जाना॥
चारि बेद अरु सिमृति पुराना। कमलापति कमल नहिं जाना॥
कह कबीर सो धरमैं नाहीं। पग लगि राम रहै सरनाहीं॥201॥

सब कोई चलन कहत है ऊँहा। ना जानी बैकुठ है कहाँ॥
आप आपका मरम न जाना। बातन ही बैकुंठ बखानाँ॥
जब लग मन बैकुंठ की आस। तब लग नाही चरन निवास॥
खाई कोटि न परल पगारा। ना जानौ बैकुंठ दुआरा॥
कहि कबीर अब कहिये काहि। साधु संगति बैकुंठे आहि॥202॥

सर्पनि ते ऊपर नहीं बलिया। जिन ब्रह्मा बिष्णु महादेव छलिया।
मारु मारु सर्पनी निर्मल जल पैठी। जिन त्रिभुवन डसिले गुरु प्रसाद डीठी॥
सर्पनी सर्पनी क्या कहहु भाई। जिन साचु पछान्या तिन सर्पनी खाई॥
सर्पनी ते आन छूछ नहीं अवरा। सर्पनी जीति कहा करै जमरा॥
इहि सर्पनी ताकी कीती होई। बल अबल क्या इसते होई॥
एह बसती ता बसत सरीरा। गुरु प्रसादि सहजि तरे कबीरा॥203॥

सरीर सरोवर भीतरै आछै कमल अनूप।
परस ज्योति पुरुषोत्तमो जाकै रेख न रूप।
रे मन हरि भजु भ्रम तजहु जग जीवन राम॥
आवत कछू न दीसई न दीसै जात॥
जहाँ उपजै बिनसै तहि जैसे पुरवनि पात।
मिथ्या करि माया तजा सुख सहज बीचारि॥
कहि कबीर सेवा करहु मन मंझि मुरारि॥204॥

सासु की दुखी ससुर की प्यारी जेठ के नाम डरौं रे।
सखी सहेली ननद गहेली देवर कै बिरहि जरौं रे॥
मेरी मति बौरी मैं राम बिसारो किन विधि रइनि रहौं रे॥
सेजै रमत नयन नहीं पेखौं इहु दुख कासौं कहौं रे॥
बाप सबका करै लराई मया सद मतवारी॥
बड़े भाई के जग संग होती तब ही नाह पियारी॥
कहत कबीर पंच को झगरा झगरत जनम गवाया॥
झूठी माया सब जग बाँध्या पै राम रमत सुख पाया॥205॥

सिव की पुरी बस बुधि सारु। यह तुम मिलि कै करहु बिचार॥
ईत ऊत की सोझौ परै। कौन कर्म मेरा करि करि मरै॥
निज पद ऊपर लागौ ध्यान। राजा राम नाम मेरा ब्रह्म ज्ञान॥
मूल दुआरै बंध्या बंधु। रवि ऊपर गहि राख्या चंदु॥
पंचम द्वारे की सिल ओड़। तिह सिल ऊपर खिड़की और॥
खिड़की ऊपर दसवा द्वार। कहि कबीर ताका अंतु न पार॥206॥

सुख माँगत दुख आगै आवै। सो सुख हमहुँ न माँग्या भावै॥
बिषगा अजहु सुरति सुख आसा। कैसे होइ है राजाराम निवासा॥
इसु सुख ते सिव ब्रह्म हराना। सो सुख हमहुँ साँच करि जाना॥
सनकादिक नारद मुनि सेखा। तिन भी तन महि मन नहीं पेखा॥
इस मन कौ कोई खोजहु भाई। तन छूटै मन कहा समाई॥
गुरु परसादी जयदेव नामा। भगति कै प्रेम इनहीं है जाना॥
इस मन कौ नहीं आवन जाना। जिसका भम गया तिन साचु पछाना॥
इस मन कौ रूप न रेख्या काई। हुकुमे होया हुकुम बूझि समाई॥
इस कन का कोई जानै भेउ। इहि मन लीण भये सुखदेउ॥
जींउ एक और सगल सरीरा। इस मन कौ रबि रहै कबीरा॥207॥

सुत अवराध करल है जेते। जननी चीति न राखसि तेते॥
रामज्या हौं बारिक तेरा। काहे न खंडसि अवगुन मेरा॥
जे अति कोप करे करि धाया। ताभी चीत न राखसि माया॥
चित्त भवन मन परो हमारा। नाम बिना कैसे उतरसि पारा॥
देहि बिमल मति सदा सरीरा। सहजि सहजि गुन रवै कबीरा॥208॥

सुन्न संध्या तेरी देव देवा करि अधपति आदि समाई।
सिद्ध समादि अंत नहीं पाया लागि रहे सरनाई॥
लेहु आरति हो पुरुष निरंजन सति गुरु पूजहु जाई॥
ठाढ़ा ब्रह्मा निगम बिचारै अलख न लखिया जाई॥
तत्तु तेल नाम कीया बाती दीपक देह उज्यारा॥
जोति लाई जगदीस जगाया बूझे बूझनहारा॥
पंचे सबद अनाहत बाजै संगे सारिंगपानी।
कबीरदास तेरी आरती कीनी निरंकार निरबानी॥209॥

सुरति सिमृति दुई कन्नी मंदा परमिति बाहर खिंथा॥
सुन्न गुफा महि आसण बैसण कल्प विवर्जित पंथा॥
मेरे राजन मैं बैरागी जोगी मरत न साग बिजोरी॥
खंड ब्रह्मांड महि सिंडी मेरा बटुवा सब जग भसमाधारी।
ताड़ी लागी त्रिपल पलटिये छूटै होइ पसारी॥
मन पवन्न दुई तूंबा करिहै जुग जुग सारद साजी॥
थिरु भई नंती टूटसि नाहीं अनहद किंगुरी बाजी॥
सुनि मन मगन भये है पूरे माया डोलत लागी॥
कहु कबीर ताकौ पुनरपि जनम नहीं खेलि गयो बैरागी॥210॥

सुरह की सैसा तेरी चाल। तेरा पूछट ऊपर झमक बाल॥
इस घर मह है सु तू ढुढ़ि खाहि। और किसही के तू मति ही जाहि॥
चाकी चाटै चून चाहि। चाकी का चीथरा कहा लै जाहि॥
छीके पर तेरी बहुत डीठ। मत लकरी सोंटा परै तेरी पीठ॥
कहि कबीर भोग भले कीन। मति कोऊ मारै ईट ठेम॥211॥

सो मुल्ला जो मन स्यो लरै। गुरु उपदेश काल स्यो जुरै॥
काल पुरुष का मरदै मान। तिस मुल्ला को सदा सलाम॥
है हुजूर कत दूरि बतावहु। दुंदर बाधहु मुंदर पावहु॥
काजी सो जो काया बिचारै। काया की अग्नि ब्रह्म पै जारै॥
सुपनै बिंदु न देई जरना। तिस काजी कौ जरा न मरना॥
सो सुरतान जो दुइ सुर तानै। बाहर जाता भीतर आनै॥
गगन मंडल महि लस्कर करै। सो सुरतान छत्रा सिर धरै॥
जोगी गोरख गोरख करै। हिंदू राम नाम उच्चरै॥
मुसलमान का एक खुदाई। कबीर का स्वामी रह्या समाई॥212॥

स्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासु।
होना है सो होइहै मनहि न कीजै आसु॥
रमय्या गुन गाइयै जाते पाइयै परम निधानु॥
क्या जप क्या तप संयमी क्या ब्रत क्या इस्नान॥
जब लग जुक्ति न जानिये भाव भक्ति भगवान॥
संपै देखि न हर्षियौ बिपति देखि न रोइ।
ज्यो संपै त्यों बिपत है बिधि ने रच्या सो होइ॥
कहि कबीर अब जानिया संतन रिदै मझारि॥
सेवक सो सेवा भले जिह घट बसै मुरारि॥213॥
हज्ज हमारी गोमती तीर। जहाँ बसहि पीतंबर पीर॥
वाहु वाहु क्या खुद गावता है। हरि का नाम मेरे मन भावता है।
नारद सारद करहि खवासी। पास बैठि बिधि कवला दासी॥
कंठे माला जिह्वा नाम। सुहस नाम लै लै करो सलाम॥
कहत कबीर राम नाम गुन गावौ। हिंदु तुरक दोऊ समझावौ॥214॥

हम घर सूत तनहि नित ताना कंठ जनेऊ तुमारे॥
तुम तो बेद पढ़हु गायत्री गोबिंद रिदै हमारे॥
मेरी जिह्ना विष्णु नयन नारायण हिरदै बसहि गोबिंदा॥
जम दुआर जब पूँछसि बबरे तब क्या कहसि मुकुंदा॥
हम गोरू तुम ग्वार गुसाइ जनम जनम रखवारे॥
कबहूँ न पार उतार चराइह कैसे खसम हमारे॥
तू बाम्हन मैं कासी का जुलाहा बूझहु मोर गियाना॥
तुम तौ पाचे भूपति राजे हरि सो मोर धियाना॥215॥

हम मसकीन खुदाई बंदे तुम राचसु मन भावै।
अल्लह अबलि दीन को साहिब जोर नहीं फुरमावै॥

काजी बोल्या बनि नहीं आवै।
रोजा धरै निवाजु गुजारै कलमा भिस्त न होई।
सत्तरि काबा घर ही भीतर जे करि जानै कोई॥
निवाजु सोई जो न्याइ बिचारै कलमा अकलहि जानै॥
पाँचहु मुसि मुसला बिछावै तब तौ दीन पछानै॥
खसम पछानि तरस करि जीय महि मारि मणी करि फीकी॥
आप जनाइ और को जानै तब होई भिस्त सरीकी॥
माटी एक भेष धरि नाना तामहि ब्रह्म पछाना।
कहै कबीर भिस्त छोड़ि करि दोजक स्यों मनमाना॥216॥

हरि बिन कौन सहाई मन का।
माता पिता भाई सुत बनिता हितु लागो सब फन का॥
आगै कौ किछु तुलहा बाँधहु क्या भरोसा धन का॥
कहा बिसासा इस भाँडे का इत नकु लगै ठनका॥
सगल धर्म पुन्न फल पावहु धूरि बाँछहु सब जन का॥
कहै कबीर सुनहु रे संतहु इहु मन उड़न पखेरू बन का॥217॥

हरि जन सुनहि न हरि गुन गावहिं। बातन ही असमान गिरावहिं॥
ऐसे लोगन स्यों क्या कहिये।
जो प्रभु कीये भगति ते बाहज। तिनते सदा डराने रहिय॥
आपन देहि चुरू भरि पानी। तिहि निंदहि जिह गंगा आनी॥
बैठत उठत कुटिलता चालहिं। आप गये औरनहू घालहिं॥
छाड़ि कुचर्चा आन न जानहिं। ब्रह्माहू का कह्यो न मानहिं॥
आप गये औरनहू खोवहि। आगि लगाइ मंदिर में सोवहिं॥
औरन हँसत आप हहिं काने। तिनको देखि कबीर लजाने॥218॥

हिंदू तुरक कहाँ ते आये किन एह राह चलाई।
दिल महि सोच बिचार कवादे भिस्त दोजक कित पाई॥

काजी तै कौन कतेब बखानी॥
पढ़त गुनत ऐसे सब मारे किनहू खबरू न जानी॥
सकति सनेह करि सुन्नति करियै मैं न बदौगा भाई॥
जौ रे खुदाई मोहि तुरक करैगा आपन ही कटि जाई॥
सुन्नत किये तुरक जे होइगा औरत का क्या करियै॥
अर्द्ध सरीरी नारि न छोड़े तातें हिंदू ही रहिये॥
छाड़ि कतेब राम भजु बौरे जुलम करत है भारी॥
कबीर पकरी टेक राम की तुरक रहे पचि हारी॥219॥

हीरै हीरा बेधि पवन मन सहजे रह्या समाई।
सकल जोति इन हीरै बेधी सतिगुरु बचनी मैं पाई॥
हरि की कथा अनाहद बानी हंस ह्नै हीरा लेइ पछानी॥
कह कबीर हीरा अस देख्यो जग महि रह्या समाई॥
गुपता हीरा प्रकट भयो जब गुरु गम दिया दिखाई॥220॥

हृदय कपट मुख ज्ञानी। झूठे कहा बिलोवसि पानी॥
काया मांजसि कौन गुना। जो घट भीतर है मलनाँ॥
लौकी अठ सठि तीरथ न्हाई। कौरापन तऊ न जाई॥
कहि कबीर बीचारी। भव सागर तारि मुरारी॥221॥

कबीर_भाग-2: पदावली_परिशिष्ट-20

रे जिय निलज्ज लाज तोहि नाहीं। हरि तजि कत काहू के जाही।
जाको ठाकुर ऊँचा होई। सो जन पर घर जात न सोही॥
सो साहिब रहिया भरपूरि। सदा संगि नाहीं हरि दूरि॥
कवला चरन सरन है जाके। कहू जन का नाहीं घर ताके।
सब कोउ कहै जासु की बाता। जी सम्भ्रथ निज पति है दाता॥
कहै कबीर पूरन जग सोई। जाकै हिरदै अवरु न होई॥181॥

रे मन तेरा कोइ नहीं खिचि लेइ जिन भार।
बिरख बसेरा पंखि कर तैसो इहु संसार॥
राम रस पीया रे जिह रस बिसरि गये रस और।
और मुये क्या रोइये जा आपा थिर न रहाइ॥
जा उपजै सो बिनसिहे दुख करि रोवै बलाइ।
जह की उपजी तह़ रची पीवतु मरद न लाग॥
कह कबीर चित चेतिया राम सिमिर बैराग॥182॥

रोजा धरै मनावै अल्लहु स्वादति जीय सँघारै।
आपा देखि अवर नहीं देखै काहे कौ झख मारै॥
काजी साहिब एक तोही महि तेरा सोच बिचार न देखै।
खबरि न करहिं दीन के बौरे ताते जनम अलेखै॥
साँच कतेब बखनै अल्लहु नारि पुरुष नहिं कोई।
पढ़ै गुनै नाहीं कछू बौरे जो दिल महि खबरि न होई॥
अल्लहु गैव सगल घट भीतर हिरदै लेहु बिचारी।
हिंदू तुरक दुइ महि एकै कहै कबीर पुकारी॥183॥

लंका सा कोट समुद्र सी खाई। तिह रावन घर खबरि न पाई।
क्या माँगै किछू थिरु न रहाई। देखत नयन चल्यो जग जाई॥
इक लख पूत सवा लख नाती। तिह रावन घर दिया न बाती॥
चंद सूर जाके तपत रसोई। बैसंतर जाके कपरे धोई॥
गुरुमति रामै नाम बसाई। अस्थिर रहै कतहू जाई॥
कहत कबीर सुनहु रे लोई राम नाम बिन मुकुति न होई॥184॥


लख चौरासी जीअ जोनि महि भ्रमन नंदुबहु थाको रे।
लगति हेतु अवतार लियो है भाग बड़ी बपुरा को रे॥
तुम जो कहत हौ नंद को नंदन नंद सु नंदन काको रे॥
धरनि अकास दसों दिसि नाहींे तब इहु नंद कहायो रे॥
संकट नहीं परै जोनि नहिं आवै नाम निरंजन जाको रे।
कबीर को स्वामी ऐसो ठाकुर जाकै माई न बापो रे॥185॥

विद्या न पढ़ो वाद नहीं जानो। हरि गुन गथत सुनत बैरानो।
मेरे बाबा मैं बौरा, सब खलक सयानो, मैं बौरा॥
मैं बिगरो बिगरै मति औरा। आपन बौरा राम कियौ बौरा॥
सतिगुरु जारि गयो भ्रम मोरा॥
मैं बिगरे अपनी मति खोई। मेरे भर्मि भूलो मति कोई।
सो बौरा आपु न पछानै। आप पछानै त एकै जानै॥
अबहिं न माता सु कबहुँन भाता। कहि कबीर रामै रंगि राता॥186॥

बिनु तत सती होई कैसे नारि। पंडित देखहु रिदे बिचारि॥
प्रीति बिना कैसे बँधे सनेहू। जब लग रस तब लग नहिं नेहू॥
साह निसत्तु करै जिय अपनै। सो रमय्यै कौ मिलै न स्वपने॥
तन मन धन गृह सौपि सरीरू। सोई सोहागनि कहै कबीरू॥187॥

बिमल अस्त्रा केते है पहिरे क्या बन मध्ये बासा॥
कहा भया नर देवा धोखे क्या जल बौरो गाता॥
जीय रे जाहिगा मैं जाना अविगत समझ इयाना।
जत जत देखौ बहुरि न पेखौ संग माया लपटना॥
ज्ञानी ध्वानी बहु उपदेसी इहु जन सगली धंधा।
कहि कबीर इक राम नाम बिनु या जग माया अंधा॥188॥

बिषया ब्यापा सकल संसारू। बिषया लै डूबा परवारू।
रे नर नाव चौंडि कत बोड़ी। हरि स्यो तोड़ि बिषया संगि जोड़ी॥
सुर नर दाधे लागी आगि। निकट नीर पसु पीवसि न झागि॥
चेतत चेतत निकस्यो नीर। सो जल निर्मल कथन कबीर॥189॥

बद कतेब इकतरा भाई दिल का फिकर न जाई।
टुक दम करारी जौ करहु हाजिर हजूर खुदाई।
बंदे खोजु दिल हर रोज ना फिरि परेसाना माहि।
इह जु दुनिया सहरु मेला दस्तगीरी नाहि॥
दरोग पढ़ि पढ़ि सुखी होह बेखबर बाद बकाहिं।
हक सच्च खालक खलक म्याने स्याममूरति नाहि॥
असमान म्याने लहंग दरिया गुसल करद त बूंद।
करि फिकरु दाइम लाइ चसमें जहँ तहाँ मौजूद॥
अल्लाह पाक पाक हैं सक करो जे दूसर होइ।
कबीर कर्म करीम का उहु करे जानै सोइ॥190॥

बेद कतेब कहहु मत झूठेइ झूठा जो न बिचारै।
जो सब मैं एकु खुदा कहत हौ तौ क्यों मुरगी मारै॥
मुल्ला कहहु नियाउ खुदाई तेरे मन का भरम न जाई।
पकरि जीउ आन्या देह बिनती माटी कौ बिसमिल किया॥
जोति सरूप अनाहत लागी कहु हलाला क्यों कीया॥

क्या उज्जू पाक किया मुह धोया क्या मसीति सिर लाया।
जौ दिले मैंहि कपट निवाजे छूजारहु क्या हज काबै जाया॥
तू नापाक पाक नहीं सूक्ष्या तिसका मरम न जान्या॥191॥

बेद की पुत्री सिंमृति भाई। सांकल जबरी लैहै आई।
आपन नगर आप ते बाँध्या। मोह कै फाधि काल सरु साध्या॥
कटी न कटै तूटि नह जाई। सो सापनि होइ जग को खाई॥
हम देखत जिन्ह सब जग लूट्या। कहु कबीर मैं राम कहि छूट्या॥192॥

बेद पुरान सबै मत सुनि के करी करम की आसा।
काल ग्रस्त सब लोग सियाने उठि पंडित पै चले निरासा॥
मन रे सरो न एकै काजा। भाज्यो न रघुपति राजा।
बन खंड जाइ जोग तप कीनो कंद मूल चुनि खाया।
नादी बेदी गबदी मौनी जम के परै लिखाया॥
भगति नारदी रिदै न आई काछि कूछि तन दीना।
राम रागनी डिंभ होइ बैठा उन हरि पहि क्या लीना॥
अरयो काल सबै जग ऊपर माहि लिखे भ्रम ज्ञानी।
कहु कबीर जन भये खलासे प्रेम भगति जिह जानी॥193॥

षट नेम कर कोठड़ी बाँधी बस्तु अनूप बीच पाई॥
कुंजी कुलफ प्रान करि राखे करते बार न लाई॥

अब मन जागत रहु रे भाई।
गाफिल होय कै जनम गवायो चोर मुसै घर जाई।
पंच पहरुआ दर महि रहते तिनका नहीं पतियारा।
चेति सुचेत चित्त होइ रहूँ तौ लै परगासु उबारा॥
नव घर देखि जु कामिनि भूली बस्तु अनूप न पाई।
कहत कबीर नवै घर मूसे दसवें तत्व समाई॥194॥

संत मिलै कछु सुनिये कहिये। मिलै असंत मष्ट करि रहियै।
बाबा बोलना कया कहियै। जैसे राम नाम रमि रहियै॥
संतन स्यों बोले उपकारी। मूरख स्यों बोले झक मारी॥
बोलत बोलत बढ़हिं बिकारा। बिनु बोले क्या करहिं बिचारा॥
कह कबीर छूछा घट बोलै। भरिया होइ सु कबहु न डोलै॥195॥

संतहु मन पवनै सुख बनिया। किछु जोग परापति गनिया।
गुरु दिखलाई मोरी। जितु मिरग पड़त है चोरी॥
मूँदि लिये दरवाजै। बाजिले अनहद बाजे॥
कुंभ कमल जल भरिया। जलौ मेट्यो ऊमा करिया॥
कहु कबीर जन जान्या। जौ जान्या तौ मन मान्या॥196॥

संता मानौ दूता डानौ इह कुटवारी मेरी॥
दिवस रैन तेरे पाउ पलोसो केस चवर करि फेरी॥
हम कूकर तेरे दरबारि। भौकाई आगे बदन पसारि॥
पूरब जनम हम तुम्हरे सेवक अब तौ मिट्या न जाई॥
तेरे द्वारे धनि सहज की मथै मेरे दगाई॥
दागे होहि सुरन महि जूझहि बिनु दागे भगि जाई॥
साधू होई सुभ गति पछानै हरि लये खजानै पाई॥
कोठरे महि कोठरी परम कोठरी बिचारि॥
गुरु दीनी बस्तु कबीर कौ लेवहु वस्तु सम्हारि॥
कबीर दोई संसार कौ लीनी जिसु मस्तक भाग॥
अमृत रस जिनु पाइया थिरता का सोहाग॥197॥

संध्या प्रात स्नान कराही। स्यों भये दादुर पानी माहीं।
जो पै राम नाम रति नाहीं। ते सवि धर्मराय कै जाहीं॥
काया रति बहु रूप रचाहीं। तिनकै दया सुपनै भी नाहीं॥
चार चरण कहहि बहु आगर। साधु सुख पावहि कलि सागर॥
कहु कबीर बहु काय करीजै। सरबस छोड़ि महा रस पीजै॥198॥

सत्तरि सै इसलारू है जाके। सवा लाख है कावर ताके॥
सेख जु कही यही कोटि अठासी। छप्पन कोटि जाके खेल खासी॥
सो गरीब की को गुजरावै। मजलसि दूरि महल को पावै॥
तेतसि करोडि है खेल खाना। चौरासी लख फिरै दिवाना॥
बाबा आदम कौ कछु न हरि दिखाई। उनभी भिस्त घनेरी पाई॥
दिल खल हलु जाकै जर दरुबानी। छोड़ि कतेब करै सैतानी॥
दुनिया दोस रोस है लोई। अपना कीया पावे सोई॥
तुम दाते हम सदा भिखारी। देउ जवाब होइ बजगारी॥
दास कबीर तेरी पनह समाना। भिस्त नजीक राखु रहमाना॥199॥

सनक आनंद अंत नहीं पाया। बेद पढ़ै ब्रह्मै जनम गवाया।
हरि का विलोबना विलोबहु मेरे भाई। सहज विलोबहु जैसे तत्व जाई॥
तन करि मटकी मन माहि बिलोई। इसु मटकी महि सबद संजोई॥
हरि का बिलोना तन का बीचारा। गुरु प्रसाद पावै अमृत धारा॥
कहु कबीर न दर करे जे मीरा। राम नाम लगि उतरे तीरा॥200॥