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kOshish karnE wAlOn kI _ कोशिश करने वालों की

kOshish karnE wAlOn kI / sOhanlAl dwivEdi ::

कोशिश करने वालों की / सोहनलाल द्विवेदी


विशेष सूचना : कई लोग इस रचना को हरिवंशराय बच्चन जी द्वारा रचित मानते हैं। लेकिन
श्री अमिताभ बच्चन ने अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में स्पष्ट किया है कि यह रचना सोहनलाल द्विवेदी जी की है।














लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती


9ClassHindi

AP _ 9 Class Hindi (SL) :

Project Work in L-1 jis dEsh mE gangA bahatI hai (जिस देश में गंगा बहती है )

National Symbols _ राष्ट्रीय चिह्न






Project Work in L-2.gAnEwAlI chiDiyA (गानेवाली चिड़िया)

Write any 5 Sentences about a Bird _ किसी एक पक्षी के बारेमें 5 वाक्य लिखो |



Project Work in L-3. badalEm apnI sOch (बदलें अपनी सोच )

paryAvaraN par bhAshaN (पर्यावरण पर भाषण )


Project Work in L-4. prakriti kI sIkh (प्रकृति की सीख)

About sOhanlAl dwiwEdi & His Poems

sOhan lAl dwivEdi _ सोहन लाल द्विवेदी


10ClassHindi

AP _ 10 Class Hindi (SL) :

Project Work in 1. barasatE bAdal ( बरसते बदल  ) :

Poetry on Nature ::प्रकृति पर कविता :

Poetry on Moon _ चन्द्र (चाँद) कविता

Poetry on Rain ::बरसा‍त पर कविता




9) पहली बार देखा झरना

Poetry on Ocean (sAgar)::सागर पर कविता






Poetry on bAdal ::बादल पर कविता

1) पानी लेकर बादल

Project Work in 2. EidgAh ( ईदगाह  ) :

वरिष्ठ नागरिकों ( बड़े बुजुर्ग ) के प्रति आदर सम्मान _कहानी

1) राम को वनवास

2) बूढ़ा पिता

3) मजाक या मदद

Project Work in 3. ham bhAratvAsI ( हम भारतवासी ) :

शांति के पथ पर समर्पित महान व्यक्ति :

Martin Luther King Jr_मार्टिन लूथर किंग

Laxminarayan Ramdas _ लक्ष्मीनारायण रामदास

Arputham Joaquin _ अर्पुथम जौकिन

Chandi Prasad Bhatt _ चंडीप्रसाद भट्ट

Project Work in 4.kaN kaN kA adhikArI ( कण-कण का अधिकारी )

vishwa shram diwas _ विश्व श्रम दिवस

Project Work in 7.bhakti pad (भक्ति पद )


AP _ 10 Class Hindi (FL) :

Project Work in Lesson 1. sundar bhArat (सुन्दर भारत )

Beauty of Nature - प्राकृतिक सौंदर्य

Beauty of Nature Poetry - प्राकृतिक सौंदर्य कविता











नावें और जहाज नदी नद
     सागर-तल पर तरते हैं।
पर नभ पर इनसे भी सुंदर
     जलधर-निकर विचरते हैं॥
इंद्र-धनुष जो स्वर्ग-सेतु-सा
     वृक्षों के शिखरों पर है।
जो धरती से नभ तक रचता
     अद्भुत मार्ग मनोहर है॥
मनमाने निर्मित नदियों के
    पुल से वह अति सुंदर है।
निज कृति का अभिमान व्यर्थ ही
    करता अविवेकी नर है।


 ~ रामनरेश त्रिपाठी (मानसी )

Nature's beauty _ प्रकृति की सुन्दरता

Nature's beauty _ प्रकृति की सुन्दरता









प्रकृति की सुन्दरता देखो
बिखरी चारों ओर है
कहीं पर पीपल कहीं अशोक
कहीं पर बरगद घोर है

लाल गुलाब से सुर्ख है
देखो धरती के दोनों गाल
लिली मोगरा और चमेली
मचा रहे है धमाल

देखो हिम से भरा हिमालय
नंदा की ऊँची पर्वत चोटी
कल कल करती बहती देखो
गंगा यमुना की निर्मल सोती

प्रकृति ने हम सबको दिया
जीवन का अनुपम संदेश
आओ मिटाए मन की दूरी
दूर हटाये कष्ट कलेश !


~ रवि प्रकाश केशरी

chandr (Moon) _ चन्द्र

chandr (Moon) poetry _ चन्द्र (चाँद) कविता








ये सर्व वीदित है चन्द्र
किस प्रकार लील लिया है
तुम्हारी अपरिमित आभा ने
भूतल के अंधकार को
क्यूँ प्रतीक्षारत हो
रात्रि के यायावर के प्रतिपुष्टि की
वो उनका सत्य है
यामिनी का आत्मसमर्पण
करता है तुम्हारे विजय की घोषणा
पाषाण-पथिक की ज्योत्सना अमर रहे
युगों से इंगित कर रही है
इला की सुकुमार सुलोचना
नही अधिकार चंद्रकिरण को
करे शशांक की आलोचना



~ सुलोचना वर्मा

prakriti_प्रकृति

prakriti - प्रकृति

Poetry on Nature ::प्रकृति पर कविता



प्रकृति
सुन्दर रूप इस धरा का,
आँचल जिसका नीला आकाश,
पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक,
उस पर चाँद सूरज की बिंदियों का ताज
नदियों-झरनो से छलकता यौवन
सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार
खेत-खलिहानों में लहलाती फसले
बिखराती मंद-मंद मुस्कान
हाँ, यही तो हैं,……
इस प्रकृति का स्वछंद स्वरुप
प्रफुल्लित जीवन का निष्छल सार II


~ डी. के. निवतियाँ

mittI kA tan mastI kA man - मिट्टी का तन, मस्ती का मन

mittI kA tan mastI kA man
मिट्टी का तन, मस्ती का मन

pyAlA/Harivanshrai Bachchan
प्याला / हरिवंशराय बच्चन

जाने माने साहित्यकार श्री हरिवंशराय बच्चन अक्सर अपने आप को
मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन - मेरा परिचय,
कह कर अपना परिचय देते थे ।





मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

१.

कल काल-रात्रि के अंधकार

में थी मेरी सत्ता विलीन,

इस मूर्तिमान जग में महान

था मैं विलुप्त कल रूप-हीं,

कल मादकता थी भरी नींद

थी जड़ता से ले रही होड़,

किन सरस करों का परस आज

करता जाग्रत जीवन नवीन ?

मिट्टी से मधु का पात्र बनूँ–

किस कुम्भकार का यह निश्चय ?

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

२.

भ्रम भूमि रही थी जन्म-काल,

था भ्रमित हो रहा आसमान,

उस कलावान का कुछ रहस्य

होता फिर कैसे भासमान.

जब खुली आँख तब हुआ ज्ञात,

थिर है सब मेरे आसपास;

समझा था सबको भ्रमित किन्तु

भ्रम स्वयं रहा था मैं अजान.

भ्रम से ही जो उत्पन्न हुआ,

क्या ज्ञान करेगा वह संचय.

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

३.

जो रस लेकर आया भू पर

जीवन-आतप ले गया छिन,

खो गया पूर्व गुण,रंग,रूप

हो जग की ज्वाला के अधीन;

मैं चिल्लाया ‘क्यों ले मेरी

मृदुला करती मुझको कठोर ?’

लपटें बोलीं,’चुप, बजा-ठोंक

लेगी तुझको जगती प्रवीण.’

यह,लो, मीणा बाज़ार जगा,

होता है मेरा क्रय-विक्रय.

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

४.

मुझको न ले सके धन-कुबेर

दिखलाकर अपना ठाट-बाट,

मुझको न ले सके नृपति मोल

दे माल-खज़ाना, राज-पाट,

अमरों ने अमृत दिखलाया,

दिखलाया अपना अमर लोक,

ठुकराया मैंने दोनों को

रखकर अपना उन्नत ललाट,

बिक,मगर,गया मैं मोल बिना

जब आया मानव सरस ह्रदय.

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

५.

बस एक बार पूछा जाता,

यदि अमृत से पड़ता पाला;

यदि पात्र हलाहल का बनता,

बस एक बार जाता ढाला;

चिर जीवन औ’ चिर मृत्यु जहाँ,

लघु जीवन की चिर प्यास कहाँ;

जो फिर-फिर होहों तक जाता

वह तो बस मदिरा का प्याला;

मेरा घर है अरमानो से

परिपूर्ण जगत् का मदिरालय.

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

६.

मैं सखी सुराही का साथी,

सहचर मधुबाला का ललाम;

अपने मानस की मस्ती से

उफनाया करता आठयाम;

कल क्रूर काल के गलों में

जाना होगा–इस कारण ही

कुछ और बढा दी है मैंने

अपने जीवन की धूमधाम;

इन मेरी उलटी चालों पर

संसार खड़ा करता विस्मय.

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

७.

मेरे पथ में आ-आ करके

तू पूछ रहा है बार-बार,

‘क्यों तू दुनिया के लोगों में

करता है मदिरा का प्रचार ?’

मैं वाद-विवाद करूँ तुझसे

अवकाश कहाँ इतना मुझको,

‘आनंद करो’–यह व्यंग्य भरी

है किसी दग्ध-उर की पुकार;

कुछ आग बुझाने को पीते

ये भी,कर मत इन पर संशय.

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

८.

मैं देख चुका जा मसजिद में

झुक-झुक मोमिन पढ़ते नमाज़,

पर अपनी इस मधुशाला में

पीता दीवानों का समाज;

यह पुण्य कृत्य,यह पाप क्रम,

कह भी दूँ,तो क्या सबूत;

कब कंचन मस्जिद पर बरसा,

कब मदिरालय पर गाज़ गिरी ?

यह चिर अनादि से प्रश्न उठा

मैं आज करूँगा क्या निर्णय ?

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

९.

सुनकर आया हूँ मंदिर में

रटते हरिजन थे राम-राम,

पर अपनी इस मधुशाला में

जपते मतवाले जाम-जाम;

पंडित मदिरालय से रूठा,

मैं कैसे मंदिर से रूठूँ ,

मैं फर्क बाहरी क्या देखूं;

मुझको मस्ती से महज काम.

भय-भ्रान्ति भरे जग में दोनों

मन को बहलाने के अभिनय.

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

१०.

संसृति की नाटकशाला में

है पड़ा तुझे बनना ज्ञानी,

है पड़ा तुझे बनना प्याला,

होना मदिरा का अभिमानी;

संघर्ष यहाँ किसका किससे,

यह तो सब खेल-तमाशा है,

यह देख,यवनिका गिरती है,

समझा कुछ अपनी नादानी !

छिप जाएँगे हम दोनों ही

लेकर अपना-अपना आशय.

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

११.

पल में मृत पीने वाले के

कल से गिर भू पर आऊँगा,

जिस मिट्टी से था मैं निर्मित

उस मिट्टी में मिल जाऊँगा;

अधिकार नहीं जिन बातों पर,

उन बातों की चिंता करके

अब तक जग ने क्या पाया है,

मैं कर चर्चा क्या पाऊँगा ?

मुझको अपना ही जन्म-निधन

‘है सृष्टि प्रथम,है अंतिम ली.

मिट्टी का तन,मस्ती का मन,

क्षण भर जीवन-मेरा परिचय !

badE bhAI sAhab - बड़े भाई साहब _3

badE bhAI sAhab - बड़े भाई साहब

मानसरोवर भाग - 1_ प्रेमचंद (mAnsarOvar bhAg - 1 _ prEmchand)

                                           3

फिर सालाना इम्तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मैं ‍‍‍‍‍‍फि‍र पास हुआ और भाई साहब फिर ‍फेल हो गये। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने कैसे दरजे में अव्वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढ़े नौ तक स्कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गयी थी, मगर बेचारे फेल हो गये। मुझे उन पर दया आती थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गयी। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले।

मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अंतर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कहीं भाई साहब एक साल और फेल हो जायँ, तो मैं उनके बराबर हो जाऊँ, ‍फिर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेंगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डाँटते हैं। मुझे उस वक्त अप्रिय लगता है अवश्य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनादन पास होता जाता हूँ और इतने अच्छे नंबरों से।

अब भाई साहब बहुत कुछ नर्म पड़ गये थे। कई बार मुझे डाँटने का अवसर पाकर भी उन्होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डाँटने का अधिकार उन्हें नहीं रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्वच्छंदता भी बढ़ी। मैं उनकि सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊँगा, पढ़ूँ या न पढ़ूँ मेरी तकदीर बलवान है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोड़ा-बहुत पढ़ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उड़ाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी की ही भेंट होता था, फिर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। माँझा देना, कन्ने बाँधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियाँ आदि समस्याथएँ अब गुप्तौ रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।

एक दिन संध्या समय होस्टल से दूर मैं एक कनकौआ लूटने बेतहाशा दौड़ा जा रहा था। आँखें आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्मा स्वर्ग से निकलकर विरक्त मन से नये संस्कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग गयी; और झाड़दार बाँस लिये उनका स्वा‍गत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहाँ सब कुछ समतल है, न मोटरकारें हैं, न ट्राम, न गाडियाँ।

सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड़ हो गयी, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्होौने वहीं मेरा हाथ पकड़ लिया और उग्र भाव से बोले- इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्हेंन शर्म नहीं आती? तुम्हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवाँ दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूँ, जो आज अव्वाल दरजे के डिप्टी मजिस्ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवीं जमात वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रों के संपादक है। बड़े-बड़े विद्वान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नहीं; लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्मलगौरव की हत्या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होंगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूँ और अब उन्हें मुझको कुछ कहने का हक नहीं है; लेकिन यह तुम्हारी गलती है। मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ और चाहे आज तुम मेरी ही जमात में आ जाओ- और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ- लेकिन मुझमें और तुममें जो पाँच साल का अंतर है, उसे तुम क्यान, खुदा भी नहीं मिटा सकता। मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ और हमेशा रहूँगा। मुझे दुनिया का और जिंदगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट्‍. ही क्यों न हो जाओ। समझ किताबें पढ़ने से नहीं आती है। हमारी अम्माँ ने कोई दरजा पास नहीं किया, और दादा भी शायद पाँचवी-छठी जमाअत के आगे नहीं गये, लेकिन हम दोनों चाहे सारी दुनिया की विद्या पढ़ ले, अम्माँ और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नहीं कि वे हमारे जन्मभदाता है, बल्कि इसलिए कि उन्हें दुनिया का हमसे ज्यादा तजरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस तरह कि राज्य -व्यिवस्थां है और आठवें हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्हें न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी बातें हैं, जिनका ज्ञान उन्हें हमसे और तुमसे ज्यादा है।

दैव न करे, आज मैं बीमार हो जाऊँ, तो तुम्हारे हाथ-पाँव फूल जायँगे। दादा को तार देने के सिवा तुम्हें और कुछ न सूझेगा; लेकिन तुम्हारी जगह पर दादा हों, तो किसी को तार न दें, न घबरायें, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डाक्टर को बुलायेंगे। बीमारी तो खैर बड़ी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नहीं जानते कि महीने भर का खर्च महीने भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते हैं, उसे हम बीस-बाईस तक खर्च कर डालते हैं और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते हैं। नाश्ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुँह चुराने लगते हैं; लेकिन जितना आज हम और तुम खर्च कर रहे हैं, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बड़ा भाग इज्जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुंब का पालन किया है, जिसमें सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्ट र साहब ही को देखो। एम.ए. हैं कि नहीं; और यहाँ के एम.ए. नहीं, ऑक्सफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते हैं, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी माँ। हेडमास्टर साहब की डिग्री यहाँ आकर बेकार हो गयी। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ में ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्मी आ गयी हैं। तो भाईजान, यह गरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नहीं चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्पड़ दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूँ। मैं जानता हूँ, तुम्हें मेरी बातें जहर लग रही हैं...

मैं उनकी इस नयी युक्ति से नत-मस्तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे मन में श्रद्धा उत्पन्न हुई। मैंने सजल आँखों से कहा- हरगिज नहीं। आप जो कुछ फरमा रहे हैं, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।

भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बोले- मैं कनकौए उड़ाने को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूँ तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्तव्य भी तो मेरे सिर पर है!

संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होस्टल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

badE bhAI sAhab - बड़े भाई साहब_2

badE bhAI sAhab - बड़े भाई साहब

मानसरोवर भाग - 1_ प्रेमचंद (mAnsarOvar bhAg - 1 _ prEmchand)

                                           2

सालाना इम्तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गये, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अंतर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आड़े हाथों लूँ- आपकी वह घोर तपस्या कहाँ गयी? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्वल भी हूँ। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिड़कने का विचार ही लज्जास्पद जान पड़ा। हाँ, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्मसम्मान भी बढ़ा। भाई साहब का वह रोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल-कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्होंने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा- आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्वल आ गया। जबान से यह हेकड़ी जताने का साहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया- उनकी सहज बुद्धि बड़ी तीव्र थी और एक दिन जब मैं भोर का सारा समय गुल्ली-डंडे की भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खींच ली और मुझ पर टूट पड़े- देखता हूँ, इस साल पास हो गये और दरजे में अव्वल आ गये, तो तुम्हें दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बड़े-बड़े का नहीं रहा, तुम्हारी क्या हस्ती, है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यों ही पढ़ गये? महज इम्त‍हान पास कर लेना कोई चीज नहीं, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढ़ो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्वामी था। ऐसे राजाओं को चक्रवर्ती कहते हैं। आजकल अंग्रेजों के राज्य का विस्तार बहुत बढ़ा हुआ है, पर इन्हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेकों राष्ट़्र अंग्रेजों का आधिपत्य स्वीकार नहीं करते। बिल्कुल स्वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बड़े-बड़े देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्या हुआ? घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करे; पर अभिमान न करे, इतराये नहीं। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।

शैतान का हाल भी पढ़ा ही होगा। उसे यह अभिमान हुआ था कि ईश्वर का उससे बढ़कर सच्चा, भक्त कोई है ही नहीं। अंत में यह हुआ कि स्वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख माँग-माँगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्हारा सिर फिर‍ गया, तब तो तुम आगे बढ़ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नहीं पास हुए, अंधे के हाथ बटेर लग गयी। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्ली-डंडे में भी अंधा-चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाय। मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आ जायगा। जब अलजबरा और जामेट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्तान का इतिहास पढ़ना पड़ेगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी ही गुजरे है। कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवाँ लिखा और सब नंबर गायब! सफाचट। सिफर भी न मिलेगा, सिफर भी! हो किस ख्याल में! दरजनो तो जेम्स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोड़ियों चार्ल्स! दिमाग चक्कर खाने लगता है। आँधी रोग हो जाता है। इन अभागों को नाम भी न जुड़ते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, सोयम, चहारुम, पंजुम लगाते चले गये। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता। और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नंबर कट गये। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्या फर्क है और व्यर्थ की बात के लिए क्यों छात्रों का खून करते हो। दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्या परवाह! वह तो वही देखते हैं, जो पुस्तक में लिखा है। चाहते हैं कि लड़के अक्षर-अक्षर रट डालें। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोड़ा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातों के पढ़ने से क्या फायदा?

इस रेखा पर वह लंब गिरा दो, तो आधार लंब से दुगुना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगुना नहीं, चौगुना हो जाय, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया- 'समय की पाबंदी' पर एक निबंध लिखो, जो चार पन्नों से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए। कौन नहीं जानता कि समय की पाबंदी बहुत अच्छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरों का उस पर स्नेह होने लगता है और उसके कारोबार में उन्नति होती है; लेकिन इस जरा-सी बात पर चार पन्ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्य में कही जा सके, उसे चार पन्ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूँ। यह तो समय की किफायत नहीं, बल्कि उसका दुरूपयोग है कि व्यर्थ में किसी बात को ठूँस दिया। हम चाहते हैं, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नहीं, आपको चार पन्ने रंगने पड़ेंगे, चाहे जैसे लिखिए। और पन्ने, भी पूरे फुलस्केप आकार के। यह छात्रों पर अत्याचार नहीं तो और क्या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबंदी पर संक्षेप में एक निबंध लिखो, जो चार पन्नों से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्ने हुए, नहीं शायद सौ-दो सौ पन्ने लिखवाते। तेज भी दौड़िये और धीरे-धीरे भी। है उल्टी बात या नहीं? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्यापकों को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड़ बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्वल आ गये हो, तो जमीन पर पाँव नहीं रखते। इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूँ, संसार का मुझे तुमसे ज्यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूँ, उसे ‍ गिरह बाँधिए नहीं पछताइयेगा।

स्कूल का समय निकट था, नहीं ईश्वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्त होती। भोजन आज मुझे निःस्वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जायँ। भाई साहब ने अपने दरजे की पढ़ाई का जो भयंकर चित्र खींचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्कूल छोड़कर घर नहीं भागा, यही ताज्जुब है; लेकिन इतने तिरस्कार पर भी पुस्तकों में मेरी अरुचि ज्यों -की-त्यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्क पूरा हो जाय और दरजे में जलील न होना पड़े। अपने ऊपर जो विश्वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्त‍ हो गया और ‍‍फिर चोरों का-सा जीवन कटने लगा।

badE bhAI sAhab - बड़े भाई साहब

badE bhAI sAhab - बड़े भाई साहब

मानसरोवर भाग - 1_ प्रेमचंद (mAnsarOvar bhAg - 1 _ prEmchand)

                                           1

मेरे भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े थे, लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था जब मैने शुरू किया था; लेकिन तालीम जैसे महत्व के मामले में वह जल्दबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भावना की बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्ता न हो, तो मकान कैसे पायेदार बने!

मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की थी,वह चौदह साल ‍के थे। उन्हें मेरी तंबीह और निगरानी का पूरा जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्म को कानून समझूँ।

वह स्वभाव से बड़े अघ्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिड़ियों, कुत्तों, बिल्लियों की तस्वीरें बनाया करते थे। कभी-कभी एक ही नाम या शब्द या वाक्य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुंदर अक्षर में नकल करते। कभी ऐसी शब्द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी- स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राधेश्याम, श्रीयुत राधेश्याम, एक घंटे तक- इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्टा की‍ कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उनसे पूछने का साहस न हुआ। वह नवीं जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह बड़ी बात थी।

मेरा जी पढ़ने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियाँ उछालता, कभी कागज की तितलियाँ उड़ाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्या कभी चारदीवारी पर चढ़कर नीचे कूद रहे हैं, कभी फाटक पर सवार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे हैं। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता- 'कहाँ थे?' हमेशा यही सवाल, इसी ध्वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुँह से यह बात क्यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि स्नेह और रोष से मिले हुए शब्दों में मेरा सत्कार करें।

'इस तरह अंग्रेजी पढ़ोगे, तो जिंदगी-भर पढ़ते रहोगे और एक हर्फ़ न आयेगा। अंग्रेजी पढ़ना कोई हँसी-खेल नहीं है कि जो चाहे पढ़ ले, नहीं, ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा सभी अंग्रेजी कि विद्वान हो जाते। यहाँ रात-दिन आँखें फोड़नी पड़ती है और खून जलाना पड़ता है, तब कहीं यह विधा आती है। और आती क्या है, हाँ, कहने को आ जाती है। बड़े-बड़े विद्वान भी शुद्ध अंग्रेजी नहीं लिख सकते, बोलना तो दूर रहा। और मैं कहता हूँ, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नहीं लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूँ, तुम अपनी आँखों देखते हो, अगर नहीं देखते, जो यह तुम्हारी आँखों का कसूर है, तुम्हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नहीं फटकता। हमेशा पढ़ता रहता हूँ, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पड़ा रहता हूँ फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्त, गँवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पड़े सड़ते रहोगे। अगर तुम्हें इस तरह उम्र गँवानी है, तो बेहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्ली-डंडा खेलो। दादा की गाढ़ी कमाई के रूपये क्यों बरबाद करते हो?'

मैं यह लताड़ सुनकर आँसू बहाने लगता। जवाब ही क्या था। अपराध तो मैंने किया, लताड़ कौन सहे? भाई साहब उपदेश की कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकड़े-टुकड़े हो जाते और हिम्मत छूट जाती। इस तरह जान तोड़कर मेहनत करने कि शक्ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा में जरा देर के लिए मैं सोचने लगता- क्यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमें हाथ डालकर क्यों अपनी जिंदगी खराब करूँ। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत ! मुझे तो चक्कर आ जाता था। लेकिन घंटे-दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढ़ूँगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्शा बनाये, बिना कोई स्कीम तैयार किये काम कैसे शुरू करूँ? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद की मद बिलकुल उड़ जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुँह-हाथ धो, नाश्ता कर पढ़ने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढ़े नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन और स्कूल। साढ़े तीन बजे स्कूल से वापस होकर आधा घंटा आराम, चार से पाँच तक भूगोल, पाँच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्टल के सामने टहलना, साढ़े छ: से सात तक अंग्रेजी कम्पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिंदी, दस से ग्यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम।

मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हल्के-हल्के झोंके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दाँव-घात, बालीबाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिवार्य रूप से खींच ले जाती और वहाँ जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जानलेवा टाइम- टेबिल, वह आँखफोड़ पुस्तकें किसी की याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आँखों से दूर रहने कि चेष्टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पाँव आता कि उन्हें खबर न हो। उनकी नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर एक नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्ति के बीच में भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकड़ा रहता है, मैं फटकार और घुडकियाँ खाकर भी खेल-कूद का तिरस्कार न कर सकता।

कबीर_भाग-2: पदावली_परिशिष्ट-21

सनक सनंद महेस समाना। सेष नाग तेरी मर्म न जाना॥

संत संगति राम रिदै बसाई।
हनुमान सरि गरुड़ समाना। सुरपति नरपति नहिं गुन जाना॥
चारि बेद अरु सिमृति पुराना। कमलापति कमल नहिं जाना॥
कह कबीर सो धरमैं नाहीं। पग लगि राम रहै सरनाहीं॥201॥

सब कोई चलन कहत है ऊँहा। ना जानी बैकुठ है कहाँ॥
आप आपका मरम न जाना। बातन ही बैकुंठ बखानाँ॥
जब लग मन बैकुंठ की आस। तब लग नाही चरन निवास॥
खाई कोटि न परल पगारा। ना जानौ बैकुंठ दुआरा॥
कहि कबीर अब कहिये काहि। साधु संगति बैकुंठे आहि॥202॥

सर्पनि ते ऊपर नहीं बलिया। जिन ब्रह्मा बिष्णु महादेव छलिया।
मारु मारु सर्पनी निर्मल जल पैठी। जिन त्रिभुवन डसिले गुरु प्रसाद डीठी॥
सर्पनी सर्पनी क्या कहहु भाई। जिन साचु पछान्या तिन सर्पनी खाई॥
सर्पनी ते आन छूछ नहीं अवरा। सर्पनी जीति कहा करै जमरा॥
इहि सर्पनी ताकी कीती होई। बल अबल क्या इसते होई॥
एह बसती ता बसत सरीरा। गुरु प्रसादि सहजि तरे कबीरा॥203॥

सरीर सरोवर भीतरै आछै कमल अनूप।
परस ज्योति पुरुषोत्तमो जाकै रेख न रूप।
रे मन हरि भजु भ्रम तजहु जग जीवन राम॥
आवत कछू न दीसई न दीसै जात॥
जहाँ उपजै बिनसै तहि जैसे पुरवनि पात।
मिथ्या करि माया तजा सुख सहज बीचारि॥
कहि कबीर सेवा करहु मन मंझि मुरारि॥204॥

सासु की दुखी ससुर की प्यारी जेठ के नाम डरौं रे।
सखी सहेली ननद गहेली देवर कै बिरहि जरौं रे॥
मेरी मति बौरी मैं राम बिसारो किन विधि रइनि रहौं रे॥
सेजै रमत नयन नहीं पेखौं इहु दुख कासौं कहौं रे॥
बाप सबका करै लराई मया सद मतवारी॥
बड़े भाई के जग संग होती तब ही नाह पियारी॥
कहत कबीर पंच को झगरा झगरत जनम गवाया॥
झूठी माया सब जग बाँध्या पै राम रमत सुख पाया॥205॥

सिव की पुरी बस बुधि सारु। यह तुम मिलि कै करहु बिचार॥
ईत ऊत की सोझौ परै। कौन कर्म मेरा करि करि मरै॥
निज पद ऊपर लागौ ध्यान। राजा राम नाम मेरा ब्रह्म ज्ञान॥
मूल दुआरै बंध्या बंधु। रवि ऊपर गहि राख्या चंदु॥
पंचम द्वारे की सिल ओड़। तिह सिल ऊपर खिड़की और॥
खिड़की ऊपर दसवा द्वार। कहि कबीर ताका अंतु न पार॥206॥

सुख माँगत दुख आगै आवै। सो सुख हमहुँ न माँग्या भावै॥
बिषगा अजहु सुरति सुख आसा। कैसे होइ है राजाराम निवासा॥
इसु सुख ते सिव ब्रह्म हराना। सो सुख हमहुँ साँच करि जाना॥
सनकादिक नारद मुनि सेखा। तिन भी तन महि मन नहीं पेखा॥
इस मन कौ कोई खोजहु भाई। तन छूटै मन कहा समाई॥
गुरु परसादी जयदेव नामा। भगति कै प्रेम इनहीं है जाना॥
इस मन कौ नहीं आवन जाना। जिसका भम गया तिन साचु पछाना॥
इस मन कौ रूप न रेख्या काई। हुकुमे होया हुकुम बूझि समाई॥
इस कन का कोई जानै भेउ। इहि मन लीण भये सुखदेउ॥
जींउ एक और सगल सरीरा। इस मन कौ रबि रहै कबीरा॥207॥

सुत अवराध करल है जेते। जननी चीति न राखसि तेते॥
रामज्या हौं बारिक तेरा। काहे न खंडसि अवगुन मेरा॥
जे अति कोप करे करि धाया। ताभी चीत न राखसि माया॥
चित्त भवन मन परो हमारा। नाम बिना कैसे उतरसि पारा॥
देहि बिमल मति सदा सरीरा। सहजि सहजि गुन रवै कबीरा॥208॥

सुन्न संध्या तेरी देव देवा करि अधपति आदि समाई।
सिद्ध समादि अंत नहीं पाया लागि रहे सरनाई॥
लेहु आरति हो पुरुष निरंजन सति गुरु पूजहु जाई॥
ठाढ़ा ब्रह्मा निगम बिचारै अलख न लखिया जाई॥
तत्तु तेल नाम कीया बाती दीपक देह उज्यारा॥
जोति लाई जगदीस जगाया बूझे बूझनहारा॥
पंचे सबद अनाहत बाजै संगे सारिंगपानी।
कबीरदास तेरी आरती कीनी निरंकार निरबानी॥209॥

सुरति सिमृति दुई कन्नी मंदा परमिति बाहर खिंथा॥
सुन्न गुफा महि आसण बैसण कल्प विवर्जित पंथा॥
मेरे राजन मैं बैरागी जोगी मरत न साग बिजोरी॥
खंड ब्रह्मांड महि सिंडी मेरा बटुवा सब जग भसमाधारी।
ताड़ी लागी त्रिपल पलटिये छूटै होइ पसारी॥
मन पवन्न दुई तूंबा करिहै जुग जुग सारद साजी॥
थिरु भई नंती टूटसि नाहीं अनहद किंगुरी बाजी॥
सुनि मन मगन भये है पूरे माया डोलत लागी॥
कहु कबीर ताकौ पुनरपि जनम नहीं खेलि गयो बैरागी॥210॥

सुरह की सैसा तेरी चाल। तेरा पूछट ऊपर झमक बाल॥
इस घर मह है सु तू ढुढ़ि खाहि। और किसही के तू मति ही जाहि॥
चाकी चाटै चून चाहि। चाकी का चीथरा कहा लै जाहि॥
छीके पर तेरी बहुत डीठ। मत लकरी सोंटा परै तेरी पीठ॥
कहि कबीर भोग भले कीन। मति कोऊ मारै ईट ठेम॥211॥

सो मुल्ला जो मन स्यो लरै। गुरु उपदेश काल स्यो जुरै॥
काल पुरुष का मरदै मान। तिस मुल्ला को सदा सलाम॥
है हुजूर कत दूरि बतावहु। दुंदर बाधहु मुंदर पावहु॥
काजी सो जो काया बिचारै। काया की अग्नि ब्रह्म पै जारै॥
सुपनै बिंदु न देई जरना। तिस काजी कौ जरा न मरना॥
सो सुरतान जो दुइ सुर तानै। बाहर जाता भीतर आनै॥
गगन मंडल महि लस्कर करै। सो सुरतान छत्रा सिर धरै॥
जोगी गोरख गोरख करै। हिंदू राम नाम उच्चरै॥
मुसलमान का एक खुदाई। कबीर का स्वामी रह्या समाई॥212॥

स्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासु।
होना है सो होइहै मनहि न कीजै आसु॥
रमय्या गुन गाइयै जाते पाइयै परम निधानु॥
क्या जप क्या तप संयमी क्या ब्रत क्या इस्नान॥
जब लग जुक्ति न जानिये भाव भक्ति भगवान॥
संपै देखि न हर्षियौ बिपति देखि न रोइ।
ज्यो संपै त्यों बिपत है बिधि ने रच्या सो होइ॥
कहि कबीर अब जानिया संतन रिदै मझारि॥
सेवक सो सेवा भले जिह घट बसै मुरारि॥213॥
हज्ज हमारी गोमती तीर। जहाँ बसहि पीतंबर पीर॥
वाहु वाहु क्या खुद गावता है। हरि का नाम मेरे मन भावता है।
नारद सारद करहि खवासी। पास बैठि बिधि कवला दासी॥
कंठे माला जिह्वा नाम। सुहस नाम लै लै करो सलाम॥
कहत कबीर राम नाम गुन गावौ। हिंदु तुरक दोऊ समझावौ॥214॥

हम घर सूत तनहि नित ताना कंठ जनेऊ तुमारे॥
तुम तो बेद पढ़हु गायत्री गोबिंद रिदै हमारे॥
मेरी जिह्ना विष्णु नयन नारायण हिरदै बसहि गोबिंदा॥
जम दुआर जब पूँछसि बबरे तब क्या कहसि मुकुंदा॥
हम गोरू तुम ग्वार गुसाइ जनम जनम रखवारे॥
कबहूँ न पार उतार चराइह कैसे खसम हमारे॥
तू बाम्हन मैं कासी का जुलाहा बूझहु मोर गियाना॥
तुम तौ पाचे भूपति राजे हरि सो मोर धियाना॥215॥

हम मसकीन खुदाई बंदे तुम राचसु मन भावै।
अल्लह अबलि दीन को साहिब जोर नहीं फुरमावै॥

काजी बोल्या बनि नहीं आवै।
रोजा धरै निवाजु गुजारै कलमा भिस्त न होई।
सत्तरि काबा घर ही भीतर जे करि जानै कोई॥
निवाजु सोई जो न्याइ बिचारै कलमा अकलहि जानै॥
पाँचहु मुसि मुसला बिछावै तब तौ दीन पछानै॥
खसम पछानि तरस करि जीय महि मारि मणी करि फीकी॥
आप जनाइ और को जानै तब होई भिस्त सरीकी॥
माटी एक भेष धरि नाना तामहि ब्रह्म पछाना।
कहै कबीर भिस्त छोड़ि करि दोजक स्यों मनमाना॥216॥

हरि बिन कौन सहाई मन का।
माता पिता भाई सुत बनिता हितु लागो सब फन का॥
आगै कौ किछु तुलहा बाँधहु क्या भरोसा धन का॥
कहा बिसासा इस भाँडे का इत नकु लगै ठनका॥
सगल धर्म पुन्न फल पावहु धूरि बाँछहु सब जन का॥
कहै कबीर सुनहु रे संतहु इहु मन उड़न पखेरू बन का॥217॥

हरि जन सुनहि न हरि गुन गावहिं। बातन ही असमान गिरावहिं॥
ऐसे लोगन स्यों क्या कहिये।
जो प्रभु कीये भगति ते बाहज। तिनते सदा डराने रहिय॥
आपन देहि चुरू भरि पानी। तिहि निंदहि जिह गंगा आनी॥
बैठत उठत कुटिलता चालहिं। आप गये औरनहू घालहिं॥
छाड़ि कुचर्चा आन न जानहिं। ब्रह्माहू का कह्यो न मानहिं॥
आप गये औरनहू खोवहि। आगि लगाइ मंदिर में सोवहिं॥
औरन हँसत आप हहिं काने। तिनको देखि कबीर लजाने॥218॥

हिंदू तुरक कहाँ ते आये किन एह राह चलाई।
दिल महि सोच बिचार कवादे भिस्त दोजक कित पाई॥

काजी तै कौन कतेब बखानी॥
पढ़त गुनत ऐसे सब मारे किनहू खबरू न जानी॥
सकति सनेह करि सुन्नति करियै मैं न बदौगा भाई॥
जौ रे खुदाई मोहि तुरक करैगा आपन ही कटि जाई॥
सुन्नत किये तुरक जे होइगा औरत का क्या करियै॥
अर्द्ध सरीरी नारि न छोड़े तातें हिंदू ही रहिये॥
छाड़ि कतेब राम भजु बौरे जुलम करत है भारी॥
कबीर पकरी टेक राम की तुरक रहे पचि हारी॥219॥

हीरै हीरा बेधि पवन मन सहजे रह्या समाई।
सकल जोति इन हीरै बेधी सतिगुरु बचनी मैं पाई॥
हरि की कथा अनाहद बानी हंस ह्नै हीरा लेइ पछानी॥
कह कबीर हीरा अस देख्यो जग महि रह्या समाई॥
गुपता हीरा प्रकट भयो जब गुरु गम दिया दिखाई॥220॥

हृदय कपट मुख ज्ञानी। झूठे कहा बिलोवसि पानी॥
काया मांजसि कौन गुना। जो घट भीतर है मलनाँ॥
लौकी अठ सठि तीरथ न्हाई। कौरापन तऊ न जाई॥
कहि कबीर बीचारी। भव सागर तारि मुरारी॥221॥