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Samas - Word Formation(hindi) (2)

शब्द निमार्ण (उपसर्ग, प्रत्यय एवं समास)

समास(SamAs)
दो या दो से अधिक पदों (शब्द) के परस्पर मेल को समास कहते हैं । इसके छः भेद हैं ।
1. तत्पुरुष समास - जिस समास में दूसरा पद प्रधान होता है, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं । जैसे -
समस्त पद विग्रह
राजमहल – राजा का महल
रसोईघर – रसोई का लिए घर
तुलसीकृत – तुलसी द्वारा कृत
यज्ञशाला – यज्ञ की शाला
रोगमुक्त – रोग से मुक्त
देश – भक्त – देश का भक्त
पवनपुत्र – पवन का पुत्र
दीनानाथ – दीनों का नाथ
वनवास – वन में वास
प्रेमसागर – प्रेम का सागर
2. कर्मधारय समास - जिन दो पदों में पहला पद दूसरे का विशेषण होता है, उसे कर्मधारय समास कहते हैं । जैसे -
समस्त पद विग्रह
श्याममेघ – श्याम रुपी मेघ
चंद्रमुख – चंद्र के समान मुख
कृष्णसर्प – कृष्ण है जो सर्प
नीलगगन – नीला है जो गगन
नीलांबर – नीला है जो अंबर
सद्धर्म – सत् है जो धर्म
लालटोपी – लाल है जो टोपी
3. द्विगु समास - जिन दो पदों में पहला पद संख्यावाचक होता है । जैसे -
समस्त पद विग्रह समस्त पद विग्रह
चौराहा – चार राहों का समूह तिराहा – तीन राहों का समूह
षट्कोण – छः कोणों का समूह पंचवटी – पाँच वटों का समूह
तिरंगा – तीन रंगों का समूह सप्ताह – सात दिनों का समूह
नवरत्न – नौ रत्नों का समूह त्रिलोक – तीन लोकों का समूह
शताब्दी – सौ अब्दों का समूह चवन्नी – चार आनों का समूह
4. द्वंद्व समास - जब अर्थ की दृष्टि से दोनों ही पदों का समान महत्व होता है । जैसे -
समस्त पद विग्रह समस्त पद विग्रह
दिन-रात – दिन और रात गुरू-शिष्य – गुरू और शिष्य
चल-अचल – चल और अचल पाप-पुण्य – पाप और पुण्य
माता-पिता – माता और पिता ऊँच-नीच – ऊँच और नीच
सुख-दुख – सुख और दुख लव-कुश – लव और कुश
5. बहुव्रीहि समास - जिन दो पदों में कोई भी पद प्रधान न हो बल्कि कोई अन्य पद प्रधान हो, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं । इसमें विग्रह करते समय ‘वाला’, ‘वाली’ या ‘जिसका’, ‘जिसके’ शब्दों का प्रयोग होता है । जैसे -
समस्त पद विग्रह
दशानन – दस आनन हैं जिसके
कमलनयन – कमल के समान नयन वाला
चतुर्भुज – चार भुजाओं वाला (विष्णु)
दिगंबर – दिशाएँ हैं अंबर (वस्त्र) जिसके
हँसमुख – हँसता हुआ है मुख जिसका
चंद्रमुखी – चंद्र के समान मुख वाली
गिरिधर – गिरि को धारण करने वाला (कृष्ण)
चतुर्मुख – चार मुखों वाला (ब्रह्मा)
पंचानन – पाँच आनन वाला (शिव)
त्रिलोचन – तीन हैं लोचन जिसके (शिव)
बहुव्रीहि समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता, बल्कि कोई अन्य पद ही प्रधान होता है, पर कर्मधारय समास में पहला पद विशेषण और दूसरा पद विशेष्य होता है या एक पद उपमान और दूसरा पद उपमेय होता है । जैसे -
पीतांबर – पीला अंबर कर्मधारय समास
- पीला है अंबर जिसका (कृष्ण) बहुव्रीहि समास
कमलनयन – कमल के समान नयन कर्मधारय
- कमल के समान नयनों वाला (कृष्ण) बहुव्रीहि
6. अव्ययीभाव समास - जिस समास में पहला पद प्रधान होता है, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं । इसमें पहला पद अव्यय होता है । जैसे -
समस्त पद विग्रह
प्रतिदिन हर दिन
बेकसूर बिना कसूर
बाकायदा कायदे के अनुसार
आमरण मरने तक़
भरपेट पेट भर के
यथाशक्ति शक्ति के अनुसार
यथाशीघ्र जितना शिघ्र हो सके
नोट – एक समान शब्दों की आवृत्ति वाले शब्द भी अव्ययीभाव समास के अंतर्गत आते हैं । जैसे – घर-घर – प्रत्येक घर
दिनोंदिन – दिन प्रतिदिन
याद रखें – समस्त पद के विग्रह के अनुसार ही समास का नाम होगा ।
कर्मधारय समास में पहला पद विशेषण और दूसरा विशेष्य या एक पद उपमान और दूसरा उपमेय होता है पर द्विगु समास में पहला पद संख्यावाचक विशेषण होता है । जैसे -
महात्मा – महान आत्मा कर्मधारय समास
नीलगगन – नीला गगन कर्मधारय समास
त्रिवेणी – तीन वेणियाँ द्विगु समास
सप्ताह – सात दिनों का समूह द्विगु समास

Shabd Nirman - Word Formation (Hindi)


शब्द निमार्ण[Word-Formation] (उपसर्ग[Prefix], प्रत्यय[Suffix] एवं समास)

उपसर्ग[Prefix]
जो शब्दांश शब्द से पहले लगकर उसके अर्थ को बदल देते हैं, उपसर्ग कहलाते हैं । जैसे -
स्व – तंत्र = स्वतंत्र निर् – बल = निर्बल
स – पूत = सपूत सु – कुमार = सुकुमार
हिन्दी में तीन प्रकार के उपसर्ग प्रचलित हैं -
1. संस्कृत के उपसर्ग जैसे – प्र, परा
2. हिन्दी के उपसर्ग जैसे – अध, नि
3. उर्दू – फारसी के उपसर्ग – बे, हर ।
1. संस्कृत के उपसर्ग
उपसर्ग अर्थ उपसर्ग के मेल से बने शब्द
अ नहीं, अभाव अधर्म, अज्ञान, अनाथ, अविद्या
अनु समान, पीछे अनुरूप, अनुज, अनुचर, अनुकरण
अव बुरा, हीन अवनति, अवगुण, अवशेष
अति अधिक अत्यधिक, अत्युत्तम, अत्यंत
अप बुरा अपयश, अपमान, अपशब्द
अन् अभाव अनादि, अनंत, अनेक, अनिच्छा
आ तक, लेकर आजीवन, आजन्म, आमरण
उप छोटा उपमंत्री, उपनाम, उपवन
उत् ऊपर, श्रेष्ठ उन्नति, उत्कर्ष, उत्कृष्ट
कु बुरा कुमति, कुसग, कुपुत्र
सु अच्छा सुपुत्र, सुराज्य, सुगंध
स्व अपना स्वराज्य, स्वदेश, स्वतंत्र
दुस् बुरा दुस्साहस, दुष्कर्म, दुश्चरित्र
दुर् बुरा, कठिन दुर्बल, दुर्गम, दुर्दशा
प्रति हर एक, उल्टा प्रतिकूल, प्रतिदिन, प्रतिहिंसा
सम् अच्छा, सहित संगति, संजय, सम्मान
2. हिन्दी के उपसर्ग
अ अभाव, निषेध अछूत, अभागा, अजान
अन आधा अनपढ़, अनबल, अनमोल
अध आधा अधपका, अधमरा, अधखिला
क, कु बुरा कपूत, कुचाल, कुढंग
स अच्छा सपूत, सपरिवार
भर पूरा भरपेट, भरपूर
3. उर्दू-फारसी के उपसर्ग
बे बुरा, अभाव बेवफा, बेसमझ, बेईमान
बद बुरा बदनाम, बदसूरत, बदबू
ना नहीं, अभाव नाकाम, नालायक, नापसंद
हर प्रत्येक हर रोज, हर वक्त, हर एक
कम थोड़ा कमअक्ल, कमबख्त, कमजोर
प्रत्यय[Suffix]
शब्दों के अंत में लगकर उनके अर्थ में परिवर्तन करने वाले शब्दांश को प्रत्यय कहते हैं । जैसे – पढ़ाई, मिलाप में क्रमशः ‘आई’ और ‘आप’ प्रत्यय हैं ।
प्रत्यय मुख्य रुप से दो प्रकार के हैं -
(क) कृत प्रत्यय - जो प्रत्यय ‘धातु’ के साथ लगकर संज्ञा और विशेषण बनाते हैं, वे कृत प्रत्यय कहलाते हैं । जैसे – खेल + औना (प्रत्यय) खिलौना, सज + आवट (प्रत्यय) सजावट ।
कुछ उदाहरण -
प्रत्यय प्रत्यय से बने शब्द
आई – लिखाई, पढ़ाई, लड़ाई, चढ़ाई ।
आ – देखा, चला, सोचा ।
आहट – घबराहट, मुस्कराहट, चिल्लाहट ।
न – चलन, लेन, देन ।
आवट – सजावट, बनावट, रूकावट ।
ना – चलना, पीना, खाना ।
(ख) तद्धित प्रत्यय - संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण शब्दों के साथ लगने वाले प्रत्यय तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं । जैसे – धन + ई = धनी, बुरा + ई = बुराई ।
कुछ उदाहरण -
प्रत्यय प्रत्यय से बने शब्द
आ – बाला, सुता, प्रिया, भूखा, प्यासा, ठंडा
इन – धोबिन, लुहारिन
नी – शेरनी, मोरनी
इया – चुहिया, बुढ़िया
आई – बुराई, लंबाई, चोड़ाई
ता – मनुष्यता, मित्रता, पशुता, लघुता, सुंदरता
त्व – मनुष्यत्व, देवत्व, प्रभुत्व
पन – लड़कपन, बचपन, बालपन
पा – पुजापा, बुढ़ापा
आहट – घबराहट, चिकनाहट, कड़वाहट
ई – धनी, क्रोधी, लोभी, मानी, पंजाबी, बंगाली, बेटी,
रस्सी
ईन – ग्रामीण, कुलीन, रंगीन
इक – धार्मिक, मासिक, साप्ताहिक, दैनिक
ईत – क्रोधित, आनंदित, शोभित, मोहित
ईय – भारतीय, अनुकरणीय, दर्शनीय
वान – गुणवान, बलवान, धनवान
मान – श्रीमान, बुद्धिमान
वाला – सब्जीवाला, फलवाला, दिलवाला, रिक्शावाला

Shabd - Word - Types (Hindi)

शब्द एवं शब्द विचार

शब्द
वर्णों अथवा अक्षरों का ऐसा समूह जिसका कोई अर्थ हो, शब्द कहलाता है । जैसे – प् + उ + स् + त् + अ + क् + अ = पुस्तक ।
यह श्ब्द है, क्योंकि इसका कुछ अर्थ है ।
वर्ण विच्छेद अर्थात शब्द के वर्णों को अलग-अलग करके लिखना । जैसे – पुस्तकालय – प् + उ + स् + त् + अ + क् + आ + ल् + अ + य् + अ
शब्द दो प्रकार के होते हैं – 1. सार्थक, 2. निरर्थक ।
सार्थक वे शब्द हैं, जिनका कोई अर्थ होता है । जैसे – बकरी, दौड़ना, आदि ।
निरर्थक वे शब्द हैं, जिनका कोई अर्थ न हो । जैसे – फड़-फड़, धर-धर आदि ।
व्याकरण में निरर्थक शब्दों का कोई महत्व नहीं होता ।
व्युत्पत्ति की दृष्टि से शब्दों के तीन भेद हैं -
1. रूढ़ -जिन शब्दों के खंडों का कोई अर्थ न हो, वे रूढ़ कहलाते हैं । जैसे – कलम, मेज़, कुर्सी, दाल, कुत्ता, आदि ।
यदि इनके खंड किए जाएँ तो इन खंडों का कोई अर्थ नहीं होगा ।
2. यौगिक – दो या दो से अधिक शब्दों अथवा शब्दांशों के योग से बने शब्द यौगिक कहलाते हैं । जैसे – जयमाला = जय + माला, दालरोटी = दाल + रोटी, विद्यालय = विद्या + आलय, कुपुत्र = कु + पुत्र, स्वदेश = स्व + देश ।
3. योगरूढ़ -जो शब्द यौगिक होने पर भी किसी विशेष अर्थ को ही प्रकट करें । जैसे – नीरज = नीर + ज ।
नीर का अर्थ है जल और ज – उत्पन्न अर्थात जल में उत्पन्न । जल में अनेक चीजें उत्पन्न होती हैं, पर नीरज ‘कमल’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है ।
उत्पत्ति की दृष्टि से शब्द चार प्रकार के होते हैं -
1. तत्सम – जो शब्द संस्कृत से ज्यों-के-त्यों हिन्दी में आ गए हैं । जैसे – नेत्र, शरीर, विद्या, फल, मनुष्य आदि ।
2. तद्भव – जो शब्द संस्कृत से रूप बदलकर हिन्दी में आ गए हों । जैसे – दाँत (दंत), माथा (मस्तक), खेत (क्षेत्र), बहु (वधू), पूत (पुत्र), दोहता (दौहित्र) आदि ।
कुछ अन्य तत्सम-तद्भव शब्द
तत्सम  - तद्भव                                            तत्सम - तद्भव
अंध अंधा                                                     अग्नि आग
अंधकार अँधेरा                                             अर्ध आधा
उपरि उपर                                                   उज्जवल उजाला
उष्ट्र उँट                                                         कर्ण कान
कर्म काम                                                     कुपुत्र कपूत
क्षेत्र खेत                                                       गृह घर
ग्राम गाँव                                                     दंत दाँत
दीपक दीया                                                  नव नया
नृत्य नाच                                                    पत्र पत्ता
मयूर मोर                                                     वधू बहू
शिक्षा सीख                                                   सर्प साँप
हस्त हाथ                                                     हास हँसी
3. देशी या देशज – वे शब्द, जो भारत की किसी भी भाषा से हिन्दी में आ गए हैं । जैसे – इडली, डोसा, समोसा, चमचम, गुलाबजामुन, लड्डु, लोटा, खिचड़ी आदि ।
4. विदेशी – जो शब्द भारत से बाहर की किसी भाषा से हिन्दी में आ गए हैं, विदेशी कहलाते हैं । ये विदेशी शब्द उर्दू, अरबी, फारसी,अंग्रेजी, पुर्तगाली, तुर्की, फ्रांसीसी, ग्रीक आदि अनेक भाषाओं से आए हैं । जैसे – जिस्म, शरीफ, मदरसा, अमीर, बाल्टी, टिकट, बटन, डॉक्टर, कालीन, कूपन, सुरंग आदि ।
प्रयोग के आधार पर शब्दों के दो भेद होते हैं -
1.विकारी – वे शब्द, जिनका रूप लिंग, वचन, कारक, काल आदि के आधार पर बदल जाता है । संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया ये विकारी शब्द हैं ।
2.अविकारी – वे शब्द, जिनके रूप में कभी कोई परिवर्तन नहीं होता । इन्हें अव्यय भी कहते हैं । क्रिया-विशेषण, समुच्चय बोधक, संबंध बोधक और विस्मयादि बोधक अविकारी शब्द हैं ।

Varn - Alphabet (Hindi)

वर्ण एवं वर्ण विचार


किसी भाषा में पाए जाने वाले सभी वर्णों के समुह को वर्णमाला कहते हैं । हिन्दी वर्णमाला में कुल 46 वर्ण हैं । इनमें 11 स्वर और 35 व्यंजन हैं ।
स्वर – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ (11)
व्यंजन – कवर्ग – क् ख् ग् घ् ड्.
चवर्ग – च् छ् ज् झ् ञ्
टवर्ग – ट् ठ् ड् ढ् ण् (ड़,ढ़ – मान्य व्यंजन) (2)
तवर्ग – त् थ् द् ध् न्
पवर्ग – प् फ् ब् भ् म्
अंतःस्थ – य् र् ल् व्
ऊष्म – श् ष् स् ह् (33)
अनुस्वार (अं) तथा विसर्ग (अः) अयोगवाह कहलाते हैं ।
अंग्रेजी और उर्दू भाषा को शुद्ध-शुद्ध लिखने के लिए नीचे लिखी ध्वनियों का प्रयोग किया जाता है –
ऑ, ख, ग, ज, फ
स्वर वे ध्वनियाँ हैं, जो बिना किसी अन्य ध्वनि की सहायता से बोली जा सकती हैं । अ, आ, इ, उ आदि स्वर हैं ।
स्वरों के तीन भेद हैं
1. ह्स्व – ये मूल स्वर कहलाते हैं । इनके उच्चारण में बहुत कम समय लगता है । अ, इ, उ और ऋ-ये चार ह्स्व स्वर हैं ।
2. दीर्घ स्वर – जिनके उच्चारण में ह्स्व स्वरों से दुगना समय लगता है, वे दीर्घ स्वर कहलाते हैं । जैसे – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ये सात दीर्घ स्वर हैं ।
3. प्लुत स्वर – जब किसी स्वर का उच्चारण लंबा करके किया जाता है, तब वह प्लुत कहलाता है । यह उच्चारण प्रायः दूर से पुकारते समय होता है । जैसे – ओ3म्, रा3म ।
उच्चारण स्थानों के आधार पर व्यंजनों को नौ वर्गों में रखा गया है जो निम्न रूप से हैं –
1. कंठ्य – जिनका उच्चारण कंठ से होता है – अ, आ, अः क्, ख्, ग्, घ्, ह्
2. तालव्य – जिनका उच्चारण तालु से होता है – च्, छ्, ज्, झ्, य्, श्, इ, ई, ज्
3. मूर्धन्य – जिनका उच्चारण मूर्द्धा से होता है – ट्, ठ्, ड्, ढ़्, र्, ऋ, ष्
4. दंत्य – जिनका उच्चारण ऊपर के दाँतों पर जीभ के लगने से होता है – त्, थ्, द्, ध्, ल्, स्
5. ओष्ठ्य – जिनका उच्चारण दोनों होंठों की सहायता से होता है – उ, ऊ, प्, फ्, ब्, भ्
6. नासिक्य – जिनका उच्चारण मुख और नासिका से किया जाता है – अं, ड़्, ञ, ण, न,म्
7. दंतोष्ठ्य – जिनका उच्चारण निचले होंठों के साथ दाँतों के मिलने से होता है – व्,
8. कंठोष्ठ्य – जिनका उच्चारण कंठ और होंठों द्वारा होता है – ओ, औ
9. कंठ तालव्य – जिनका उच्चारण कंठ और तालु दोनों से होता है – ए, ऐ
हिन्दी में स्वरों का प्रयोग दो प्रकार से होता है – स्वतंत्र प्रयोग और व्यंजनों के साथ मिलाकर प्रयोग । जैसे – आई, आइए, आओ में स्वरों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया गया है । पर स्वरों का व्यंजनों के साथ प्रयोग करते हैं तो स्वरों के रूप में परिवर्तन कर दिया जाता है । स्वरों के इसी बदले हुए रूप को मात्रा कहते हैं । प्रत्येक स्वर की मात्रा और उसका प्रयोग इस प्रकार है-
स्वर मात्रा प्रयोग
अ कोइ मात्रानहीं क्+अ=क
आ लाला, मामा
इ मिल, खिल
ई दीदी, ढीली
उ मुकुल, मुकुट
ऊ धूम, घूम
ऋ कृपा, मृग
ए नेक, मेरे
ऐ मैना, रैना
ओ भोला, बोलो
औ पौधा, कौआ
जिन वर्णों के उच्चारण में किसी स्वर की सहायता लेनी पड़ती है, वे व्यंजन कहलाते हैं । क, ख, ग, घ, प, फ, ब आदि व्यंजन हैं ।
व्यंजनों के तीन भेद हैं –
1. स्पर्श, 2. अंतःस्थ, 3. ऊष्मा ।
क से म तक पच्चीस व्यंजन स्पर्श हैं ।
य, र, ल, व अंतःस्थ हैं ।
श, ष, स, ह ऊष्म हैं ।
इनके अतिरिक्त चार संयुक्त अक्षर भी हैं –
क्ष = क्+ष्+अ
त्र = त्+र्+अ
ज्ञ = ज्+ञ+अ
श्र = श्+र्+अ
अनुस्वार – जिस स्वर का उच्चारण करते समय हवा केवल नाक से निकलती है और उच्चारण कुछ जोर से किया जाता है और लिखते समय वर्ण के ऊपर केवल बिंदु (.) लगाया जाता है, उसे अनुस्वार कहते हैं ।
जैसे – चंचल, कंठ, ठंड, कंधा आदि
अनुनासिका – जिन स्वरों का उच्चारण मुख और नासिका दोनों से होता है । इस स्वर को लिखने के समय वर्ण के ऊपर चंद्रबिंदु का प्रयोग होता है । किंतु यदि स्वर की मात्रा शिरोरेखा पर लगे तो चंद्रबिंदु के स्थान पर केवल बिंदु का ही प्रयोग किया जाता है । जैसे – आँख, कहीं आदि ।
वर्णों के परस्पर मेल को वर्ण संयोग कहते हैं । यह प्रायः दो प्रकार से होता है –
1. व्यंजन और स्वर का संयोग और
2. व्यंजन तथा व्यंजन का संयोग ।
व्यंजन और स्वर का संयोग – व्यंजनों का उच्चारण स्वरों के मेल के बिना नहीं हो पाता । व्यंजनों के साथ जब स्वरों को मिलाकर लिखा जाता है तो वह व्यंजन और स्वर का संयोग कहलाता है । जैसे – क्+ए=के; क्+आ = का ।
जब व्यंजन स्वर के बिना होता है तो व्यंजन के निचे हलंत लगा देते हैं ।
जैसे – क्, च्, ट्, त् आदि ।
व्यंजन तथा व्यंजन का संयोग – व्यंजन से व्यंजन मिलाने के अनेक नियम हैं –
1. कई व्यंजनों के अंत में एक खड़ी रेखा होती है, इसे पाई कहते हैं । ख, ग, घ, च, ज, झ आदि व्यंजन पाई वाले हैं । जब ऐसे व्यंजनों को आगे वाले व्यंजन से मिलाते हैं तो इनकी पाई हटा ली जाती है । जैसे – स्नान, स्तुति, सम्मान, सत्य ।
2. बिना पई वाले व्यंजनों को जब किसी अन्य व्यंजन से मिलाते हैं तो इनमें हलंत लगा देते हैं । जैसे – विद्यालय, बुद्ध, चिह्न, भद्दा ।
3. ‘क’ और ‘फ’ को दूसरे व्यंजनों से मिलाने के लिए इन वर्णों की घुंडी के झुके भाग को हटा दिया जाता है । जैसे – वक्त, रक्त, रफ्ता ।
4. ‘र्’ अगले वर्ण से मिलाए जाने पर उसके ऊपर लग जाता है । जैसे – पर्वत, सौंदर्य, धर्म, कर्म, सूर्य ।
5. ‘र’ से पहले यदि कोई स्वर रहित व्यंजन दो तो ‘र’ उसके नीचे लगाया जाता है । जैसे – प्राप्त, पत्र, चक्र, चंद्र ।
6. ‘ट्’ और ‘ड्’ में ‘र’ के मिलाने पर ‘र’ क्रमशः इस प्रकार जुड़ जाता है – ट्+र= ट्र (ट्रक), ड्+र= ड्र (ड्रम)
7. ‘श्’ के साथ ‘र’ के मिलाने पर श्र हो जाता है ।
8. ‘स’ के साथ ‘र’ के संयोग से स्त्र होता है ।

Sandhi in Hindi

संधि

संधि शब्द का अर्थ है ‘मेल’। दो निकटवर्ती वर्णों के परस्पर मेल से जो विकार (परिवर्तन) होता है वह संधि कहलाता है। जैसे – सम् + तोष = संतोष ; देव + इंद्र = देवेंद्र ; भानु + उदय = भानूदय।
संधि के भेद
संधि तीन प्रकार की होती हैं -
स्वर संधि
व्यंजन संधि
विसर्ग संधि
स्वर संधि
दो स्वरों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को स्वर-संधि कहते हैं। जैसे – विद्या + आलय = विद्यालय।
स्वर-संधि पाँच प्रकार की होती हैं -
दीर्घ संधि
गुण संधि
वृद्धि संधि
यण संधि
अयादि संधि
दीर्घ संधि
ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ के बाद यदि ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ आ जाएँ तो दोनों मिलकर दीर्घ आ, ई, और ऊ हो जाते हैं। जैसे -
(क) अ और अ की संधि
अ + अ = आ –> धर्म + अर्थ = धर्मार्थ / अ + आ = आ –> हिम + आलय = हिमालय
आ + अ = आ –> विद्या + अर्थी = विद्यार्थी / आ + आ = आ –> विद्या + आलय = विद्यालय
(ख) इ और ई की संधि
इ + इ = ई –> रवि + इंद्र = रवींद्र ; मुनि + इंद्र = मुनींद्र
इ + ई = ई –> गिरि + ईश = गिरीश ; मुनि + ईश = मुनीश
ई + इ = ई- मही + इंद्र = महींद्र ; नारी + इंदु = नारींदु
ई + ई = ई- नदी + ईश = नदीश ; मही + ईश = महीश .
(ग) उ और ऊ की संधि
उ + उ = ऊ- भानु + उदय = भानूदय ; विधु + उदय = विधूदय
उ + ऊ = ऊ- लघु + ऊर्मि = लघूर्मि ; सिधु + ऊर्मि = सिंधूर्मि
ऊ + उ = ऊ- वधू + उत्सव = वधूत्सव ; वधू + उल्लेख = वधूल्लेख
ऊ + ऊ = ऊ- भू + ऊर्ध्व = भूर्ध्व ; वधू + ऊर्जा = वधूर्जा
गुण संधि
इसमें अ, आ के आगे इ, ई हो तो ए ; उ, ऊ हो तो ओ तथा ऋ हो तो अर् हो जाता है। इसे गुण-संधि कहते हैं जैसे -
(क) अ + इ = ए- नर + इंद्र = नरेंद्र ; अ + ई = ए- नर + ईश = नरेश
आ + इ = ए- महा + इंद्र = महेंद्र ; आ + ई = ए महा + ईश = महेश
(ख) अ + उ = ओ ज्ञान + उपदेश = ज्ञानोपदेश ; आ + उ = ओ महा + उत्सव = महोत्सव
अ + ऊ = ओ जल + ऊर्मि = जलोर्मि ; आ + ऊ = ओ महा + ऊर्मि = महोर्मि।
(ग) अ + ऋ = अर् देव + ऋषि = देवर्षि
(घ) आ + ऋ = अर् महा + ऋषि = महर्षि
वृद्धि संधि
अ, आ का ए, ऐ से मेल होने पर ऐ तथा अ, आ का ओ, औ से मेल होने पर औ हो जाता है। इसे वृद्धि संधि कहते हैं। जैसे -
(क) अ + ए = ऐ एक + एक = एकैक ; अ + ऐ = ऐ मत + ऐक्य = मतैक्य ;
आ + ए = ऐ सदा + एव = सदैव ; आ + ऐ = ऐ महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य
(ख) अ + ओ = औ वन + ओषधि = वनौषधि ; आ + ओ = औ महा + औषधि = महौषधि ;
अ + औ = औ परम + औषध = परमौषध ; आ + औ = औ महा + औषध = महौषध
यण संधि
(क) इ, ई के आगे कोई विजातीय (असमान) स्वर होने पर इ ई को ‘य्’ हो जाता है।
(ख) उ, ऊ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर उ ऊ को ‘व्’ हो जाता है।
(ग) ‘ऋ’ के आगे किसी विजातीय स्वर के आने पर ऋ को ‘र्’ हो जाता है। इन्हें यण-संधि कहते हैं।
इ + अ = य् + अ यदि + अपि = यद्यपि ई + आ = य् + आ इति + आदि = इत्यादि।
ई + अ = य् + अ नदी + अर्पण = नद्यर्पण ई + आ = य् + आ देवी + आगमन = देव्यागमन
(घ) उ + अ = व् + अ अनु + अय = अन्वय उ + आ = व् + आ सु + आगत = स्वागत
उ + ए = व् + ए अनु + एषण = अन्वेषण ऋ + अ = र् + आ पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा
अयादि संधि
ए, ऐ और ओ औ से परे किसी भी स्वर के होने पर क्रमशः अय्, आय्, अव् और आव् हो जाता है। इसे अयादि संधि कहते हैं।
(क) ए + अ = अय् + अ ने + अन + नयन
(ख) ऐ + अ = आय् + अ गै + अक = गायक
(ग) ओ + अ = अव् + अ पो + अन = पवन
(घ) औ + अ = आव् + अ पौ + अक = पावक
औ + इ = आव् + इ नौ + इक = नाविक
व्यंजन संधि
व्यंजन का व्यंजन से अथवा किसी स्वर से मेल होने पर जो परिवर्तन होता है उसे व्यंजन संधि कहते हैं। जैसे-शरत् + चंद्र = शरच्चंद्र।
(क) किसी वर्ग के पहले वर्ण क्, च्, ट्, त्, प् का मेल किसी वर्ग के तीसरे अथवा चौथे वर्ण या य्, र्, ल्, व्, ह या किसी स्वर से हो जाए तो क् को ग् च् को ज्, ट् को ड् और प् को ब् हो जाता है। जैसे -
क् + ग = ग्ग दिक् + गज = दिग्गज। क् + ई = गी वाक् + ईश = वागीश
च् + अ = ज् अच् + अंत = अजंत ट् + आ = डा षट् + आनन = षडानन
प + ज + ब्ज अप् + ज = अब्ज
(ख) यदि किसी वर्ग के पहले वर्ण (क्, च्, ट्, त्, प्) का मेल न् या म् वर्ण से हो तो उसके स्थान पर उसी वर्ग का पाँचवाँ वर्ण हो जाता है। जैसे -
क् + म = ड़् वाक् + मय = वाड़्मय च् + न = ञ् अच् + नाश = अञ्नाश
ट् + म = ण् षट् + मास = षण्मास त् + न = न् उत् + नयन = उन्नयन
प् + म् = म् अप् + मय = अम्मय
(ग) त् का मेल ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, व या किसी स्वर से हो जाए तो द् हो जाता है। जैसे -
त् + भ = द्भ सत् + भावना = सद्भावना त् + ई = दी जगत् + ईश = जगदीश
त् + भ = द्भ भगवत् + भक्ति = भगवद्भक्ति त् + र = द्र तत् + रूप = तद्रूप
त् + ध = द्ध सत् + धर्म = सद्धर्म
(घ) त् से परे च् या छ् होने पर च, ज् या झ् होने पर ज्, ट् या ठ् होने पर ट्, ड् या ढ् होने पर ड् और ल होने पर ल् हो जाता है। जैसे -
त् + च = च्च उत् + चारण = उच्चारण त् + ज = ज्ज सत् + जन = सज्जन
त् + झ = ज्झ उत् + झटिका = उज्झटिका त् + ट = ट्ट तत् + टीका = तट्टीका
त् + ड = ड्ड उत् + डयन = उड्डयन त् + ल = ल्ल उत् + लास = उल्लास
(ड़) त् का मेल यदि श् से हो तो त् को च् और श् का छ् बन जाता है। जैसे -
त् + श् = च्छ उत् + श्वास = उच्छ्वास त् + श = च्छ उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट
त् + श = च्छ सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र
(च) त् का मेल यदि ह् से हो तो त् का द् और ह् का ध् हो जाता है। जैसे -
त् + ह = द्ध उत् + हार = उद्धार त् + ह = द्ध उत् + हरण = उद्धरण
त् + ह = द्ध तत् + हित = तद्धित
(छ) स्वर के बाद यदि छ् वर्ण आ जाए तो छ् से पहले च् वर्ण बढ़ा दिया जाता है। जैसे -
अ + छ = अच्छ स्व + छंद = स्वच्छंद आ + छ = आच्छ आ + छादन = आच्छादन
इ + छ = इच्छ संधि + छेद = संधिच्छेद उ + छ = उच्छ अनु + छेद = अनुच्छेद
(ज) यदि म् के बाद क् से म् तक कोई व्यंजन हो तो म् अनुस्वार में बदल जाता है। जैसे -
म् + च् = ं किम् + चित = किंचित म् + क = ं किम् + कर = किंकर
म् + क = ं सम् + कल्प = संकल्प म् + च = ं सम् + चय = संचय
म् + त = ं सम् + तोष = संतोष म् + ब = ं सम् + बंध = संबंध
म् + प = ं सम् + पूर्ण = संपूर्ण
(झ) म् के बाद म का द्वित्व हो जाता है। जैसे -
म् + म = म्म सम् + मति = सम्मति म् + म = म्म सम् + मान = सम्मान
(ञ) म् के बाद य्, र्, ल्, व्, श्, ष्, स्, ह् में से कोई व्यंजन होने पर म् का अनुस्वार हो जाता है। जैसे -
म् + य = ं सम् + योग = संयोग म् + र = ं सम् + रक्षण = संरक्षण
म् + व = ं सम् + विधान = संविधान म् + व = ं सम् + वाद = संवाद
म् + श = ं सम् + शय = संशय म् + ल = ं सम् + लग्न = संलग्न
म् + स = ं सम् + सार = संसार
(ट) ऋ,र्, ष् से परे न् का ण् हो जाता है। परन्तु चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, श और स का व्यवधान हो जाने पर न् का ण् नहीं होता। जैसे -
र् + न = ण परि + नाम = परिणाम र् + म = ण प्र + मान = प्रमाण
(ठ) स् से पहले अ, आ से भिन्न कोई स्वर आ जाए तो स् को ष हो जाता है। जैसे -
भ् + स् = ष अभि + सेक = अभिषेक नि + सिद्ध = निषिद्ध वि + सम + विषम
विसर्ग-संधि
विसर्ग (:) के बाद स्वर या व्यंजन आने पर विसर्ग में जो विकार होता है उसे विसर्ग-संधि कहते हैं। जैसे- मनः + अनुकूल = मनोनुकूल।
(क) विसर्ग के पहले यदि ‘अ’ और बाद में भी ‘अ’ अथवा वर्गों के तीसरे, चौथे पाँचवें वर्ण, अथवा य, र, ल, व हो तो विसर्ग का ओ हो जाता है। जैसे – मनः + अनुकूल = मनोनुकूल ; अधः + गति = अधोगति ; मनः + बल = मनोबल
(ख) विसर्ग से पहले अ, आ को छोड़कर कोई स्वर हो और बाद में कोई स्वर हो, वर्ग के तीसरे, चौथे, पाँचवें वर्ण अथवा य्, र, ल, व, ह में से कोई हो तो विसर्ग का र या र् हो जाता है। जैसे -
निः + आहार = निराहार ; निः + आशा = निराशा निः + धन = निर्धन
(ग) विसर्ग से पहले कोई स्वर हो और बाद में च, छ या श हो तो विसर्ग का श हो जाता है। जैसे -
निः + चल = निश्चल ; निः + छल = निश्छल ; दुः + शासन = दुश्शासन
(घ) विसर्ग के बाद यदि त या स हो तो विसर्ग स् बन जाता है। जैसे -
नमः + ते = नमस्ते ; निः + संतान = निस्संतान ; दुः + साहस = दुस्साहस
(ड़) विसर्ग से पहले इ, उ और बाद में क, ख, ट, ठ, प, फ में से कोई वर्ण हो तो विसर्ग का ष हो जाता है। जैसे -
निः + कलंक = निष्कलंक ; चतुः + पाद = चतुष्पाद ; निः + फल = निष्फल
(ड) विसर्ग से पहले अ, आ हो और बाद में कोई भिन्न स्वर हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है। जैसे -
निः + रोग = निरोग ; निः + रस = नीरस
(छ) विसर्ग के बाद क, ख अथवा प, फ होने पर विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता। जैसे -
अंतः + करण = अंतःकरण

Idioms In Hindi - 1

मुहावरे और उनका प्रयोग - Hindi Idioms and their Usage

मुहावरा :- विशेष अर्थ को प्रकट करने वाले वाक्यांश को मुहावरा कहते है। मुहावरा पूर्ण वाक्य नहीं होता, इसीलिए इसका स्वतंत्र रूप से प्रयोग नहीं किया जा सकता । मुहावरा का प्रयोग करना और ठीक -ठीक अर्थ समझना बड़ा की कठिन है ,यह अभ्यास से ही सीखा जा सकता है । इसीलिए इसका नाम मुहावरा पड़ गया ।

यहाँ पर कुछ प्रसिद्ध मुहावरे और उनके अर्थ वाक्य में प्रयोग सहित दिए जा रहे है।

१.अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना - (स्वयं अपनी प्रशंसा करना ) - अच्छे आदमियों को अपने मुहँ मियाँ मिट्ठू बनना शोभा नहीं देता ।
२.अक्ल का चरने जाना - (समझ का अभाव होना) - इतना भी समझ नहीं सके ,क्या अक्ल चरने गए है ?
३.अपने पैरों पर खड़ा होना - (स्वालंबी होना) - युवकों को अपने पैरों पर खड़े होने पर ही विवाह करना चाहिए ।
४.अक्ल का दुश्मन - (मूर्ख) - राम तुम मेरी बात क्यों नहीं मानते ,लगता है आजकल तुम अक्ल के दुश्मन हो गए हो ।
५.अपना उल्लू सीधा करना - (मतलब निकालना) - आजकल के नेता अपना अपना उल्लू सीधा करने के लिए ही लोगों को भड़काते है ।
६.आँखे खुलना - (सचेत होना) - ठोकर खाने के बाद ही बहुत से लोगों की आँखे खुलती है ।
७.आँख का तारा - (बहुत प्यारा) - आज्ञाकारी बच्चा माँ -बाप की आँखों का तारा होता है ।
८.आँखे दिखाना - (बहुत क्रोध करना) - राम से मैंने सच बातें कह दी , तो वह मुझे आँख दिखाने लगा ।
९.आसमान से बातें करना - (बहुत ऊँचा होना) - आजकल ऐसी ऐसी इमारते बनने लगी है ,जो आसमान से बातें करती है ।
१० .ईंट से ईंट बजाना - (पूरी तरह से नष्ट करना) - राम चाहता था कि वह अपने शत्रु के घर की ईंट से ईंट बजा दे।
११.ईंट का जबाब पत्थर से देना - (जबरदस्त बदला लेना) - भारत अपने दुश्मनों को ईंट का जबाब पत्थर से देगा ।
१२.ईद का चाँद होना - (बहुत दिनों बाद दिखाई देना) - राम ,तुम तो कभी दिखाई ही नहीं देते ,ऐसा लगता है कि तुम ईद के चाँद हो गए हो ।
१३.उड़ती चिड़िया पहचानना - (रहस्य की बात दूर से जान लेना) - वह इतना अनुभवी है कि उसे उड़ती चिड़िया पहचानने में देर नहीं लगती ।
१४.उन्नीस बीस का अंतर होना - (बहुत कम अंतर होना) - राम और श्याम की पहचान कर पाना बहुत कठिन है ,क्योंकि दोनों में उन्नीस बीस का ही अंतर है ।
१५.उलटी गंगा बहाना - (अनहोनी हो जाना) - राम किसी से प्रेम से बात कर ले ,तो उलटी गंगा बह जाए ।