Hindi Grammar after The Sepoy Rebellion of 1857 -
सिपाही विद्रोह (1857) के पश्चात् उन्नीसवीं शताब्दी के हिन्दी व्याकरण
सिपाही विद्रोह के बाद शिक्षा विभाग की स्थापना होने पर पं. रामजसन की "भाषा-तत्त्व-बोधिनी" प्रकाशित हुई, जिसमें कहीं-कहीं हिन्दी और संस्कृत की मिश्रित प्रणालियों का प्रयोग किया गया । इसके बाद पं. श्रीलाल का "भाषा चंद्रोदय" प्रकाशित हुआ, जिसमें हिन्दी व्याकरण के कुछ अधिक नियम थे । फिर सन् 1869 ई. में बाबू नवीनचंद्र राय कृत "नवीन-चंद्रोदय" निकला, जिसमें 'भाषा चंद्रोदय' के बारे में टिप्पणी भी थी । इसके पश्चात् मराठी और संस्कृत व्याकरण के आधार पर और बहुत कुछ अंग्रेजी ढंग पर पं. हरिगोपाल पाध्ये ने अपनी 'भाषा-तत्त्व-दीपिका' लिखी । लेखक के महाराष्ट्रीय होने के कारण इस पुस्तक में स्वभावतः मराठीपन पाया जाता है ।
पादरी W. एथारिंगटन का प्रसिद्ध हिन्दी व्याकरण "भाषा भास्कर" बनारस से 1873 में प्रकाशित हुआ, जिसकी सत्ता लगभग 50 वर्ष तक बनी रही । इसका सन् 1913 का संस्करण डेक्कन कॉलेज, पुणे में उपलब्ध है । पं. कामता प्रसाद गुरु ने अपने "हिन्दी व्याकरण" की भूमिका में लिखा है - "अधिकांश में दूषित होने पर भी इस पुस्तक के आधार और अनुकरण पर हिन्दी के कई छोटे-मोटे व्याकरण बने और बनते जाते हैं । यह पुस्तक अंगरेजी ढंग पर लिखी गई है । हिन्दी में यह अंगरेजी प्रणाली इतनी प्रिय हो गई है कि इसे छोड़ने का पूरा प्रयत्न आज तक नहीं किया गया । मराठी, गुजराती, बँगला आदि भाषाओं के व्याकरणों में भी बहुधा इसी प्रणाली का अनुकरण पाया जाता है ।"
सन् 1875 में राजा शिवप्रसाद का हिन्दी व्याकरण निकला । पं. कामता प्रसाद गुरु लिखते हैं - "इस पुस्तक में दो विशेषताएँ हैं । पहली विशेषता यह है कि पुस्तक अंगरेजी ढंग की होने पर भी इसमें संस्कृत व्याकरण के सूत्रों का अनुकरण किया गया है; और दूसरी यह कि हिन्दी के व्याकरण के साथ-साथ नागरी अक्षरों में उर्दू का भी व्याकरण दिया गया है । इस समय हिन्दी और उर्दू के स्वरूप के विषय में वाद-विवाद उपस्थित हो गया था, और राजा साहब दोनों बोलियों को एक बनाने के प्रयत्न में अगुआ थे, इसीलिए आपको ऐसा दोहरा व्याकरण बनाने की आवश्यकता हुई । इसी समय भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने बच्चों के लिए एक छोटा-सा हिन्दी व्याकरण लिखकर इस विषय की उपयोगिता और आवश्यकता सिद्ध कर दी ।"
सन् 1876 में इलाहाबाद और कलकत्ते से S.H. केलॉग का "A Grammar of the Hindi Language" प्रकाशित हुआ, जिसका परवर्द्धित तृतीय संस्करण 1938 में निकला । इसमें उच्च हिन्दी के साथ-साथ ब्रज एवं तुलसीदासकृत रामचरितमानस की पूर्वी हिन्दी एवं राजपुताना, कुमाउँ, अवध, रिवा, भोजपुर, मगध, संबंधी विस्तृत नोट भी हैं । तृतीय संस्करण का पुनर्मुद्रण कई प्रकाशकों ने किया है, जैसे एशियन एजुकेशनल सर्विसेज एवं मुंशीराम मनोहर लाल, दिल्ली ।
फ्रेड्रिक पिंकॉट द्वारा लिखित "The Hindi Manual" लन्दन से 1882 में प्रकाशित हुआ, जिसमें साहित्यिक और प्रान्तीय दोनों प्रकार के हिन्दी व्याकरण शामिल किये गये । इसका तीसरा संस्करण 1890 में निकला । M. शूल्ट्स का 'Grammatik der hinduistanischen Sprache' (हिन्दुस्तानी भाषा का व्याकरण) जर्मन भाषा में Leipzig से 1894 में प्रकाशित हुआ ।
एडविन ग्रीब्ज लिखित "A Grammar of Modern Hindi" बनारस से 1896 में प्रकाशित हुआ । इस लेखक ने केलॉग के हिन्दी व्याकरण को एक मानक कृति बताया है । परन्तु सामान्य लोगों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ग्रीब्ज ने अन्य व्याकरण रचा । इसका संशोधित संस्करण 1908 में प्रकाशित हुआ । सन् 1921 में इस लेखक ने पूर्णतः नये रूप से "Hindi Grammar" नामक शीर्षक के अन्तर्गत हिन्दी व्याकरण लिखा, जिसमें ब्रज भाषा में कुछ नोट के सिवा हिन्दी के क्षेत्रीय अंतरों का कोई जिक्र नहीं किया गया । इसका पुनर्मुद्रण एशियन एजुकेशनल सर्विसेज ने 1983 में किया ।
पाश्चात्य विद्वानों द्वारा लिखे गये हिन्दी व्याकरणों का थोड़ा विस्तृत विवरण डॉ. जाधव की थीसिस में पृ. 148-171 के अंतर्गत देखा जा सकता है ।
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